“आँखें पथरायी तेरे इंतजार में ओ विकास “

कह रहिन ककाजी / मनोज : विकास – विकास – विकास । सुन – सुनकर कान पक रहे थे । कब आएगा विकास । लोग राह तक रहे थे । बुनियादी अर्थों मेंं । विकास का चिंतन था । चौक – चौराहे से लेकर चाय – चौपाल पर । विकास ही मंथन था । कोई कहता विकास आयेगा । कोई कहता जो है विकास । वह भी गर्त में मिल जाएगा । कहने वाले बताते चंद्रयान, राफेल वायुयान, पुलवामा , पाकिस्तान । पुछने वाले चीखते। क्या इससे बच जायेगा अभिमान । सँवर पायेगा हमारा हिन्दुस्तान । शहर के हालात । नित प्रतिदिन बढते वारदात । हत्या – अपहरण , लूट- छीनतई, अत्याचार – व्याभिचार । क्या इन मुद्दे पर सजग है सरकार । राह चलते निर्दोष की हत्या । अबला से छीना – झपटी । रोज – रोज की लूट । गबन की छूट ।

ककाजी चिंतन में थे । सालों से विकास के पुकार पर । अच्छे दिन के इंतजार पर । क्या – क्या सपने दिखाए थे । गैस के दाम पर ।पेट्रोल के नाम पर । काला धन वापस लायेंगे । हर खाते में लाखों जमा करायेंगे । मुनिया सुरक्षित होगी । विकास आरक्षित होगा ।हर हाथ को मिलेगा काम । देश का विश्व मानचित्र पर बढ़ेगा नाम ।

ककाजी जी तब ख्वाहिशें पाल बैठे थे । कितना अच्छा होगा । देश में सदाचार बढ़ेगा । भ्रष्टाचार का नाम मिटेगा । सबका साथ होगा । हर कदम विकास होगा ।वैसे भी माहौल कितना गंदा हो चला है । टू जी स्पेक्ट्रम से कोयला घोटाले तक । राष्ट्रमंडल खेल से ताबूत सजाने तक । वर्दी से लेकर बाढ़ मिटाने तक । सिर्फ – सिर्फ और सिर्फ हो रहा था भ्रष्टाचार । व्याभिचार । तभी दामिनी सरेआम नंगी की जा रही थी । नवरूणा घर से खींच कर मारी जा रही थी । माल्या – मोदी देश लूट ले जा रहे थे । घर से हँसते निकल विदेशों में शरण पा रहे थे ।अन्ना का हाल बूरा था ।फिर भी नजर लोकपाल पर गड़ा था ?

मन बोला । चलो परिवर्तन होगा तो नये आयाम बनेंगे । देश के लूटे पकड़े जायेंगे । घोटालेबाज सजा पायेंगे । उम्मीद बढी । बदलाव लायेंगे । जब मुखिया करेंगे विकास ! फिर क्युँ न अच्छे दिन आयेंगे ?

लेकिन बातों – बातों में एक नही, दो नहीं, पाँच साल गुजर गये ।कैसा बनना था आशियाँ । लेकिन बना बनाया गुलशन उजड़ गये । न आईडीपीएल का ताला खुला ।न चीनी मिलों ने धुंआ उगला । न औद्योगिक विकास हुआ । उल्टे बटलर के सायरन बंद हो गये । कर्मचारी सड़क पर आ गये। वे जोड़ने लगे । विकास का इतिहास। जिसका जो जितना उड़ा रहे थे उपहास । आज वही कर रहे थे विकास । चोरी – डकैती लूट – हत्या – अपहरण का जारी था व्यापार । फ़र्क इतना था कल बच जाते थे दस – बीस – सौ- हजार में ।आज देने पड़ रहे थे बड़े – बड़े उपहार । चहुँओर मचा है । आज भी हाहाकार । पेट्रोल- डीजल की बढ़ती कीमत । माँ बहन की लूटती अस्मत । गरीबों की फूटी किस्मत। दाल – टमाटर की बढ़ती बोली। बात- बात पर चलती गोली । गिरती लाशें ।लूटते जज्बात । मुखिया करते बस । मन की बात ।

मंथन के इसी दौर में ।भुजंगी ने चाय पिलाया । थोड़ा झुंझलाया फिर सुर में सुर मिलाया । किस चिंतन में पड़ गये साहेब । हाथी के दो दाँत हैं जैसे । नेतवन होते सब एक जैसे । ऊपर से चाहे जितना लड़ लें । अंदर से इनकी होती यारी । उनके राज में ‘साह’ थे मुजरिम। इनमें ‘चिदंमबरम’ है सरदार। कोई तड़ीपार। कोई जेल में यार। न वो साधु था। न ये हैं संत। क्या होगा इनके पाप का अंत । जुमले चाहे लाख उड़ा लें । ठाठ – वाट इनको प्यारी । वरना क्या मजाल । नीरव भाग जाता । माल्या बैंक का लोन न चुकाता । कालाधन वापस न आता । भ्रष्टाचारी जेल न जाता ।क्यों दामिनी लूटी जाती । बेटियाँ मारी जाती । सरेआम विधायक खून बहाते । सड़क पर पुलिस गोली न खाती । मंत्री अहम से न ऐसे इतराते । कि प्रतिनिधि की जगह माई बाप बन जाते।

साहब जब आप ही कवच बन जाओगे । क्या चोरो को पकड़ पाओगे । सच तो यही है विकास गुम है उधेड़बुन में । बस गद्दी है आज मून (चाँद) में। मची रहे चहुँओर जय जयकार । सरकार को बस इतनी दरकार । नमो – नमो , नमो – नमो । चाहे जितना जप लो भाई । खेल चलेगा वही पुराना । मंदिर – मस्जिद , ऊँच – नीच , भेदभाव की खाई । राज करेंगे जैसे हो मिलजुल । चोर – चोर मौसेरे भाई !*