क्यों होती है छठी मैया और सूर्य देव की आराधना, सनातन धर्म में क्या है इस महापर्व का महत्व? जानें

पटना: बिहार में महापर्व छठ पूजा को लेकर तैयारियां जोरों पर है. ‘षष्ठी’ का अर्थ होता है छठी और इस दिन देवियों में से षष्ठी देवी की पूजा की जाती है. जो संतान की रक्षा और आरोग्य की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं. छठी मैया की पूजा विशेष रूप से बिहार पूर्वांचल सहित उत्तर भारत में बड़े ही श्रद्धा भाव से की जाती है.

चार दिनों का होता है महापर्व

चार दिनों तक चलने वाले छठ पूजा के अनुष्ठान में पहले दिन नहाए खाए से शुरुआत होती है. महापर्व के दूसरे दिन खरना का पूजा होता है. तीसरे दिन संध्या का अर्घ्य दिया जाता है. महापर्व के चौथे दिन सुबह के अर्घ्य के साथ चार दिनों के छठ पर्व का अनुष्ठान संपन्न होता है.

सूर्य और छठी मैया को अर्घ देने की परंपरा

छठ महापर्व में छठी मैया एवं सूर्य देवता की पूजा के महत्व की जानकारी दी. कहा कि हर देवता की एक शक्ति स्वरूपा होती है. सूर्य देवता की शक्ति स्वरूपा छठी मैया ही हैं. पौराणिक कथा के अनुसार 6 कृतिका ने मिलकर देवी का रूप लिया.

छठी मैया की स्तुति में श्लोक

छठी मैया की कृपा और उनकी महिमा का गुणगान शास्त्रों में इस प्रकार किया गया है.

“ॐ षष्ठिदेवि नमस्तुभ्यं सर्वसौभाग्यदायिनि।
पुत्रान् देहि धनं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥”

इस श्लोक का अर्थ है

हे षष्ठी देवी! आपको नमस्कार है. आप सभी सौभाग्य प्रदान करने वाली हैं. हमें पुत्र, धन और यश का वरदान दीजिए और हमारे शत्रुओं का नाश कीजिए. इस स्तुति से स्पष्ट है कि छठी मैया को जीवन में सुख-समृद्धि और संतान के स्वास्थ्य की देवी माना गया है.

छठी मैया का इतिहास और महत्व

प्राचीन कथाओं के अनुसार, जब राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी मालिनी को संतान सुख प्राप्त नहीं हो रहा था. तब उन्होंने महर्षि कश्यप के परामर्श से यज्ञ किया. यज्ञ के परिणामस्वरूप उन्हें संतान तो मिली पर वह मृत जन्मी थी. तब माता षष्ठी ने प्रकट होकर उन्हें अपने विधि-विधान से पूजा करने का उपदेश दिया. राजा और रानी ने माता षष्ठी के इस विधान को अपनाया और उन्हें संतान सुख प्राप्त हुआ. तभी से छठ पूजा की परंपरा शुरू हुई.

छठी मैया की पूजा और प्रकृति का संरक्षण

छठी मैया की पूजा प्रकृति और मानव के बीच संतुलन को बनाए रखने का भी प्रतीक है. छठ पर्व में बांस की टोकरियों, मिट्टी के दीप और प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग होता है जो पर्यावरण को स्वच्छ रखने का संदेश देता है. छठ पूजा के दौरान नदियों और तालाबों में स्नान करके जल स्रोतों की शुद्धता का ध्यान रखा जाता है. यह हमें सिखाती है कि मनुष्य को प्रकृति के प्रति आभार और श्रद्धा रखना चाहिए.

संतान की रक्षा, परिवार का कल्याण की आराधना

छठी मैया का नाम हमें उनकी विशेषताओं, उनके आशीर्वाद और उनकी कृपा की याद दिलाता है. संतान की रक्षा, परिवार का कल्याण और प्रकृति के प्रति प्रेम, यही छठ पूजा का संदेश है. इस पर्व के माध्यम से समाज में अनुशासन, श्रद्धा और संयम का संचार होता है.

सदियों से पूजित हैं छठी मैया

छठी मैया की उपासना हर उस श्रद्धालु के लिए एक आशीर्वाद की तरह है, जो संतान सुख, आरोग्य और परिवार की समृद्धि के लिए उनकी कृपा की कामना करता है. “ॐ जय षष्ठी माई, आशीषों की सदा बरसात हो. छठी मैया के चरणों में सबका मंगल हो॥” इस प्रकार, छठी मैया का नाम और उनकी महिमा हमारी संस्कृति में सदियों से पूजित और प्रतिष्ठित रही है.

सूर्य उपासना से पहले षष्ठी देवी की पूजा

किसी भी देवता की पूजा से पहले उनकी शक्ति की पूजा की जाती है. जैसे विष्णु की पूजा से पहले लक्ष्मी की पूजा, महादेव की पूजा से पहले पार्वती जी की पूजा, ब्रह्मा की पूजा से पहले सरस्वती जी की पूजा जाती है. वैसे ही सूर्य उपासना से पहले षष्ठी देवी की पूजा की जाती है.

किसे दिया जाता है संध्या का अर्घ

चार दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में संध्या का अर्घ्य सूर्य की शक्ति स्वरूपा षष्ठी माता को पड़ता है. इसीलिए शाम के अर्थ को प्रतिहार षष्ठीव्रत कहा जाता है. संध्याकालीन आराधना में सूर्य की सविता जो षष्ठी मां के नाम से जानी जाती है. उनके निमित्त सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. प्रतिहार षष्ठी व्रत उपासना के बाद उदयकालिक व्रत में सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है.

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