19 गाड़ियों वाले कारवां के साथ कैबिनेट बैठक में पहुंचे सीएम सम्राट चौधरी ,पीएम की ईंधन बचत की अपील पर भारी पड़े VIP काफिले, तमाशा जारी

नरेंद्र मोदी की वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच देशवासियों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने की अपील एक बार फिर सुर्खियों में है। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि अपीलों की सादगी और सत्ता के काफिलों का तामझाम अक्सर एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।इसी कड़ी में बिहार की सियासत का नज़ारा भी कुछ अलग नहीं रहा। पटना में आयोजित कैबिनेट बैठक के दौरान मंत्रियों और अधिकारियों के बड़े-बड़े काफिलों ने सड़क पर ऐसा दृश्य पेश किया, जिसे देखकर “ईंधन बचाओ, देश बचाओ” का संदेश कहीं पीछे छूटता नजर आया।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के काफिले को लेकर दावा किया गया कि कुल 19 वाहनों का मूवमेंट रहा, जिसमें इलेक्ट्रिक वाहन, एम्बुलेंस, जैमर और सुरक्षा वाहनों का पूरा घेरा शामिल था। यानी सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर पूरा “मोबाइल सिस्टम” सड़क पर उतरा दिखाई दिया।इसी तरह अन्य मंत्रियों के काफिलों ने भी चर्चा बटोरी। रत्नेश सादा, संजय टाइगर और अन्य नेताओं के काफिलों में अलग-अलग संख्या में गाड़ियां शामिल रहीं। कहीं 2 गाड़ियां, कहीं 3, तो कहीं 4 गाड़ियों का मूवमेंट देखा गया।

मंत्री संतोष कुमार सुमन के काफिले में भी चार गाड़ियां शामिल बताई गईं, जिनमें से एक गाड़ी को लेकर यह चर्चा रही कि वह लगभग खाली थी। वहीं अन्य मंत्रियों जैसे दीपक प्रकाश, विजय सिन्हा और श्वेता गुप्ता के काफिलों में भी 2 से 3 गाड़ियों का मूवमेंट देखा गया।सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब देश का शीर्ष नेतृत्व सादगी और ईंधन बचत की बात कर रहा है, तो सत्ता के गलियारों में काफिलों का यह “शो ऑफ” कितना उचित है? क्या सुरक्षा और व्यवस्था के नाम पर बढ़ता यह वाहन बेड़ा अपीलों को कमजोर नहीं करता?

दरअसल, यह पूरा दृश्य सिर्फ गाड़ियों की संख्या का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का आईना है जहां संदेश और व्यवहार के बीच की दूरी अक्सर सबसे ज्यादा दिखाई देती है। आम जनता को सार्वजनिक परिवहन अपनाने की सलाह दी जाती है, लेकिन वीआईपी मूवमेंट में ईंधन की खपत का सवाल हमेशा पीछे रह जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच देशवासियों से पेट्रोल और डीज़ल की खपत कम करने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और अनावश्यक यात्राओं से बचने की जो सादगी भरी अपील की थी, वह ज़मीन पर उतरती कम और काफिलों में बिखरती ज़्यादा दिखाई दे रही है।

एक तरफ प्रधानमंत्री की अपील ऊर्जा बचाओ, देश बचाओ” का संदेश देती है, तो दूसरी तरफ बिहार की सियासी तस्वीर कुछ और ही कहानी बयान कर रही है। बिहार कैबिनेट बैठक के दौरान मंत्रियों और अधिकारियों के भारी-भरकम काफिले ने सड़क पर ऐसा दृश्य पेश किया, जिसे देखकर सादगी की अपील खुद सवालों में घिरती नजर आई। पटना की सड़कों पर जब वीआईपी गाड़ियों की लंबी कतारें दौड़ीं, तो आम लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई कि क्या ईंधन बचत सिर्फ आम जनता के लिए है? सत्ता के गलियारों में सादगी की बात तो खूब होती है, लेकिन काफिलों की रफ्तार और चमक अलग ही संदेश देती है।

हालांकि इसी बीच मंत्री जमा खान ने दावा किया कि उन्होंने प्रधानमंत्री की अपील को गंभीरता से लेते हुए अपने काफिले की गाड़ियों की संख्या कम की है। वहीं मंत्री संतोष सुमन के काफिले में कथित तौर पर खाली गाड़ी देखी गई, जिसने सियासी बहस को और हवा दे दी।राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि जब देश का शीर्ष नेतृत्व ईंधन बचत और संसाधनों के संतुलित उपयोग की अपील कर रहा है, तो क्या राज्य स्तर पर इसे सिर्फ “औपचारिक संदेश” मान लिया गया है? या फिर सत्ता का रुतबा ही उस सादगी पर भारी पड़ जाता है जिसकी नसीहत जनता को दी जाती है?

दरअसल, यह पूरा दृश्य सिर्फ काफिलों का नहीं बल्कि उस मानसिकता का आईना है, जहां अपीलें मंचों पर गूंजती हैं और सड़कों पर उनका अर्थ बदल जाता है। आम जनता सार्वजनिक परिवहन अपनाने की ओर बढ़ती है, जबकि वीआईपी मूवमेंट में ईंधन की खपत और बढ़ जाती है। इस पूरे मामले ने एक बार फिर सियासी “कहने और करने” के फर्क को उजागर कर दिया है, जहां सादगी की बात तो होती है, लेकिन व्यवहार में चमक-दमक ही हावी नजर आती है।

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