पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी के बाद नीतीश सरकार में शामिल कांग्रेस भी शराबबंदी के मौजूदा कानून पर सवाल उठाने लगी है। सत्तारूढ़ महागठबंधन में इस सवाल पर मतभेद बढ़ता ही जा रहा है। बड़ा हिस्सा कानून की समीक्षा करने, इसे और सख्त करने या रद करने के पक्ष में दलील दे रहा है। इन सबमें कम से कम एक बात पर सहमति नजर आती है कि कानून अपना असर नहीं दिखा रहा है।
चर्चा की शुरुआत जदयू संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के इस बयान से हुई कि बिना व्यापक जन सहयोग के शराबबंदी कानून का पूरी तरह सफल होना संभव नहीं है। उनके बयान की व्याख्या शराबबंदी कानून की विफलता के रूप में की गई। बाद में कुशवाहा ने सफाई दी कि उन्होंने कभी शराबबंदी कानून को फेल नहीं कहा था।
कांग्रेस विधायक ने पूरी तरह फेल बताया
कांग्रेस की विधायक प्रतिमा दास ने शनिवार को दो टूक कहा कि शराबबंदी पूरी तरह फेल है। उन्होंने कहा-मैं सचमुच की विधायक हूं। गांवों में जाती हूं। गरीबों से मिलती हूं। मुझे पता है कि इस कानून के चलते कैसे किसी गरीब परिवार का इकलौता सदस्य जेल में है। लोग भूख से मर रहे हैं। जदयू के लोग कह रहे हैं मुख्यमंत्री ने राजस्व की परवाह किए बिना शराबबंदी कानून को लागू किया। इधर हालत यह है कि धन के अभाव में स्कूलों में कुर्सी-टेबुल नहीं है। बालिकाओं के स्कूलों में शौचालय नहीं है। मेरी मांग है कि सरकार इस कानून को रद करे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी चुनिंदा सलाहकारों के बदले स्वतंत्र एजेंसी से जमीनी सच्चाई का पता लगाना चाहिए।

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष भी सहमत
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डा. मदन मोहन झा ने सीधे शराबबंदी कानून को विफल तो नहीं बताया, लेकिन समय-समय पर इसमें संशोधन की सलाह दी। उन्होंने कहा कि अब तक उन्हें शराबबंदी कानून का बहुत अधिक लाभ नहीं दिखा। बहुत प्रयास के बाद भी शराब की तस्करी पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाई है। उन्होंने कानून रद करने की राय नहीं दी, लेकिन यह जरूर कहा कि कानून का लक्ष्य हासिल करने के लिए ठोस प्रयास किए जाने चाहिए। संशोधन की तत्काल जरूरत है।
मांझी शुरू से हैं विरोधी
पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी शुरू से ही पूर्ण शराबबंदी के विरोधी रहे हैं। अप्रैल 2016 में महागठबंधन की सरकार में यह लागू हुआ था। उसी समय मांझी ने विरोध किया था। उनका कहना था कि दिन भर मेहनत करने के बाद रात में थोड़ी पी लेने से अच्छी नींद आती है। बाद के दिनों में उन्होंने यहां तक कहा कि इस कानून का उपयोग गरीबों के खिलाफ हो रहा है। अमीर लोग और बड़े सरकारी अधिकारी रोज शराब पीते हैं। उनपर कानून का असर नहीं होता है। मांझी ने हाल में फिर शराबबंदी कानून की आलोचना की है।


