नेपाल की बाढ़ का बिहार को खौफनाक तोहफा! गंडक में मिली खतरनाक मछलियां, सरकार ने चेताया

नेपाल में 26 अगस्त को आई तबाही का असर अब बिहार में भी नजर आने लगा है। बाढ़ का पानी अपने साथ मलबे के अलावा गंडक नदी में कई तरह की मछलियां भी बहाकर ला रहा है। गोपालगंज में मछुआरों के जाल में गोइता यानी गूंछ कैटफिश और थाई मांगुर जैसी मछलियां बड़ी संख्या में फंसने का दावा किया गया है। इन मछलियों को लेकर अब लोगों के बीच खौफ और चिंता का माहौल है।

नेपाल में बाढ़ आने के तीसरे दिन यानी 29 अगस्त की सुबह गोपालगंज के मंगलपुर घाट पर मछुआरों ने गंडक नदी से भारी मात्रा में मछलियां पकड़ीं। दावा किया गया है कि कई क्विंटल मछलियां पकड़ी गईं और उन्हें पश्चिम बंगाल के बाजारों में भेज दिया गया। मछुआरों के मुताबिक, जाल में करीब 45 किलो, 40 किलो, 38 किलो और 27 किलो तक वजन वाली मछलियां भी फंसीं। कुछ छोटी मछलियों का वजन करीब पांच किलो बताया गया है।

मछुआरों के अनुसार, गंडक में गोइता, थाई मांगुर, बराली यानी वल्लागो कैटफिश, ग्रास कार्प और रोहू जैसी मछलियां मिली हैं। एक गूंछ कैटफिश का वजन करीब 60 किलो होने का भी दावा किया गया है। मछुआरों ने बताया कि नदी में मरी हुई मछलियों को भी जाल से निकाला जा रहा है और बाजार में बेचकर परिवार का खर्च चलाया जा रहा है।

हालांकि, बिहार सरकार के मत्स्य निदेशालय ने लोगों को सतर्क किया है। निदेशालय ने बाढ़ के पानी से सीधे पकड़ी गई मछलियों की खरीद-बिक्री में सावधानी बरतने और बिना जांच के ऐसी मछलियां नहीं खाने की अपील की है। लिहाजा मछलियों को लेकर फैल रही तमाम आशंकाओं के बीच सरकारी जांच और वैज्ञानिक पुष्टि बेहद अहम हो जाती है। गूंछ कैटफिश यानी गोइता को लेकर कई जगहों पर इसे बेहद आक्रामक शिकारी मछली के तौर पर जाना जाता है। इसका शरीर लंबा, सिर चौड़ा और चपटा होता है। मुंह के आसपास मूंछ जैसी संरचनाएं यानी बार्बेल्स होती हैं। शरीर पर शल्क नहीं होते और इसके जबड़े में नुकीले दांत पाए जाते हैं।यह आमतौर पर गहरे और तेज बहाव वाले पानी में रहती है और दूसरे जलीय जीवों का शिकार करती है। हालांकि इंसानों पर हमले और इसे खाने से कैंसर होने जैसे दावों को लेकर वैज्ञानिक पुष्टि जरूरी है। इसलिए बिना प्रमाण ऐसी बातों को सच मानना उचित नहीं होगा।

थाई मांगुर कैटफिश समूह की मछली है। इसे वैज्ञानिक रूप से क्लैरियस गैरीपिनस कहा जाता है। यह कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहने में सक्षम मछली मानी जाती है और पानी से बाहर भी कुछ समय तक रह सकती है।भारत में थाई मांगुर के पालन को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं रही हैं। दूसरी मछलियों और जलीय पारिस्थितिकी पर इसके संभावित प्रभाव के कारण इसके पालन और कारोबार पर रोक लगाई गई थी।ऐसे में नेपाल की बाढ़ के बाद गंडक में मिली इन मछलियों को लेकर प्रशासन के लिए चुनौती दोहरी है एक तरफ बाढ़ के साथ आई जलीय प्रजातियों की निगरानी, दूसरी तरफ बाजार में उनकी अवैध खरीद-बिक्री पर नजर। फिलहाल लोगों के लिए सबसे अहम संदेश यही है कि बाढ़ के पानी से सीधे पकड़ी गई किसी भी मछली को बिना जांच और आधिकारिक सलाह के खाने से बचें।

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