बिहार विधान परिषद सभापति पद जदयू के खाते में जाने की तैयारी, BJP से बनी सहमति; जल्द होगा बड़ा ऐलान

पटना: बिहार की नई सियासी तस्वीर में अब एक और बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। सत्ता में साझेदार जनता दल यूनाइटेड (जदयू) को बिहार विधान परिषद के सभापति का पद मिलने की राह लगभग साफ हो गई है। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, इसको लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर और खास तौर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) तथा जदयू के बीच सहमति बन चुकी है। ऐसे में आने वाले दिनों में जदयू के किसी वरिष्ठ विधान पार्षद को परिषद के शीर्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। इस घटनाक्रम को बिहार की नई सरकार में सत्ता के संतुलन और एनडीए के भीतर जिम्मेदारियों के बंटवारे से जोड़कर देखा जा रहा है। फिलहाल विधान परिषद के सभापति का पद भाजपा के वरिष्ठ नेता अवधेश नारायण सिंह के पास है। नई सरकार के गठन के बाद से ही इस बात की चर्चा तेज थी कि विधान परिषद के सभापति का पद अब जदयू के हिस्से में जा सकता है।

भाजपा के पास कई अहम पद, इसलिए जदयू की दावेदारी मजबूत

दरअसल, मौजूदा राजनीतिक समीकरण में सरकार के कई महत्वपूर्ण संवैधानिक पद भाजपा के पास हैं। मुख्यमंत्री पद के अलावा बिहार विधानसभा के अध्यक्ष और विधान परिषद के सभापति जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भाजपा का प्रतिनिधित्व है। ऐसे में एनडीए की दूसरी बड़ी सहयोगी पार्टी जदयू की ओर से विधान परिषद सभापति पद पर दावेदारी स्वाभाविक मानी जा रही थी। सूत्रों की मानें तो इसी राजनीतिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए भाजपा और जदयू के बीच इस पद को लेकर सहमति बनी है। अब केवल औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार है। जदयू खेमे से किसी अनुभवी और वरिष्ठ विधान पार्षद को यह जिम्मेदारी दिए जाने की संभावना जताई जा रही है। यह बदलाव सिर्फ एक संवैधानिक पद का बदलाव नहीं होगा, बल्कि एनडीए सरकार के भीतर दोनों प्रमुख दलों के बीच शक्ति-संतुलन का भी संकेत देगा।

पहले भी जदयू के पास रहा है सभापति का पद

बिहार विधान परिषद के सभापति पद पर जदयू का दावा नया नहीं है। इससे पहले जदयू के वरिष्ठ नेता देवेश चन्द्र ठाकुर करीब दो वर्षों तक विधान परिषद के सभापति रह चुके हैं। लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता छोड़ दी थी। इसके साथ ही उन्हें सभापति के पद से भी इस्तीफा देना पड़ा था।इसके बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता अवधेश नारायण सिंह को विधान परिषद का सभापति बनाया गया। अब सत्ता के नए समीकरण में एक बार फिर यह पद जदयू के खाते में जाने की चर्चा है। जदयू के पास इस पद का पुराना अनुभव भी है। पार्टी के उपसभापति रहे हारुण रसीद करीब तीन वर्षों तक विधान परिषद के कार्यकारी सभापति की भूमिका निभा चुके हैं। हालांकि उस समय राज्य में महागठबंधन की सरकार थी।

विधानसभा में भी दिखेगा सत्ता संतुलन

बिहार के मौजूदा राजनीतिक समीकरण में भाजपा और जदयू के बीच मुकाबला बेहद करीबी है। विधानसभा में भाजपा के पास 88 विधायक हैं, जबकि जदयू के 85 विधायक हैं। यानी दोनों दलों की ताकत में बहुत बड़ा अंतर नहीं है। ऐसे में विधान परिषद के सभापति पद का जदयू के पास जाना एनडीए के भीतर राजनीतिक संतुलन को मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। विधान परिषद की तस्वीर भी दिलचस्प है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक परिषद में भाजपा के 25 सदस्य हैं, जबकि जदयू के पास 20 सदस्य हैं। राजद के 15, कांग्रेस के दो और निर्दलीय सात सदस्य हैं। इसके अलावा सीपीआई, सीपीएम, हम, रालोमो, लोजपा आर और रालोजपा के एक-एक सदस्य हैं।इस संख्या को देखते हुए विधान परिषद में भी भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन जदयू की भूमिका महत्वपूर्ण है। ऐसे में सभापति पद मिलने से जदयू को सदन के संचालन और संसदीय राजनीति में एक अहम संवैधानिक भूमिका हासिल होगी।

विधानसभा अध्यक्ष भाजपा के, सभापति जदयू के होने की संभावना

एनडीए के भीतर पदों के बंटवारे की तस्वीर को देखें तो बिहार विधानसभा के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी फिलहाल डॉ. प्रेम कुमार संभाल रहे हैं। ऐसे में अगर विधान परिषद का सभापति पद जदयू को मिलता है तो दोनों सदनों के शीर्ष पदों में संतुलन कायम होता दिखाई देगा। बिहार की राजनीति में इससे पहले भी ऐसा समीकरण देखने को मिला है। पूर्व में जब विधान परिषद के सभापति का पद भाजपा के पास था, तब विधानसभा अध्यक्ष का पद जदयू कोटे में रहा था। अब समीकरण बदलने के बाद एक बार फिर दोनों सहयोगी दलों के बीच संवैधानिक पदों का संतुलन बनाने की कोशिश नजर आ रही है।

किसे मिलेगी जिम्मेदारी, इस पर नजर

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जदयू की ओर से विधान परिषद के सभापति पद के लिए किस वरिष्ठ एमएलसी का नाम सामने आता है। पार्टी के पास कई अनुभवी नेता हैं और ऐसे में अंतिम फैसला शीर्ष नेतृत्व को करना होगा। सभापति का पद संवैधानिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। विधान परिषद की कार्यवाही को व्यवस्थित ढंग से संचालित करने, सदन में अनुशासन बनाए रखने और संसदीय नियमों के मुताबिक कार्यवाही चलाने में सभापति की अहम भूमिका होती है। यही वजह है कि जदयू के लिए यह पद केवल राजनीतिक हिस्सेदारी नहीं, बल्कि विधान परिषद में प्रभाव बढ़ाने का भी महत्वपूर्ण अवसर होगा।

एनडीए के रिश्तों के लिए भी अहम फैसला

बिहार की राजनीति में भाजपा और जदयू लंबे समय से एक-दूसरे के प्रमुख सहयोगी रहे हैं। सरकार में दोनों दलों की भागीदारी के बीच महत्वपूर्ण पदों का बंटवारा हमेशा राजनीतिक संदेश देता है। ऐसे में विधान परिषद सभापति पद जदयू को दिया जाना दोनों दलों के बीच तालमेल का संकेत माना जा रहा है। अगर जल्द ही जदयू के किसी वरिष्ठ एमएलसी के नाम पर मुहर लगती है तो बिहार की नई सत्ता संरचना में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ जाएगा। फिलहाल राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि जदयू की झोली में सभापति का पद तो लगभग तय माना जा रहा है, लेकिन उस कुर्सी पर कौन बैठेगा, इसका इंतजार अभी बाकी है।

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