मुजफ्फरपुर की मिट्टी में आकार ले रही लीची की पहचान, ‘लीचीपुरम’ से संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का अनोखा संदेश

मुजफ्फरपुर: शाही लीची के लिए देश-दुनिया में पहचान रखने वाला मुजफ्फरपुर अब अपनी मिट्टी से भी लीची की कहानी कह रहा है। ‘लीचीपुरम : एक अनहद सृजन’ के तहत मिट्टी के कलाकार प्रहलाद पंडित द्वारा लीची की थीम पर तैयार की जा रही कलाकृतियां शहर की संस्कृति, पर्यावरण और स्थानीय पहचान को एक नया रूप दे रही हैं। यह पहल ‘मीठा मुस्कुराने का दूसरा वर्ष’ के चौथे महीने और चौथे सप्ताह में भी लगातार जारी है।

लीचीपुरम अभियान के तहत मिट्टी से लीची की आकृति वाले बर्तन, पूजा-सामग्री, उपहार-सामग्री, गुल्लक, दैनिक उपयोग की वस्तुएं और स्मृति-चिह्न तैयार किए जा रहे हैं। इन कृतियों को महज मिट्टी की कलाकृतियों के बजाय मुजफ्फरपुर की मिट्टी, संस्कृति और लीची की पहचान से जोड़कर देखा जा रहा है।

इस पहल की पृष्ठभूमि में लीची के बागों के लगातार कम होने और उससे जुड़े पर्यावरणीय एवं सांस्कृतिक सरोकारों को लेकर चिंता भी जुड़ी है। इसी उद्देश्य से पर्यावरणविद् सुरेश गुप्ता द्वारा शुरू किए गए ‘लीचीपुरम सांस्कृतिक पुनर्जागरण अभियान’ से जुड़कर प्रजापति समाज के मिट्टी के कलाकार प्रहलाद पंडित मिट्टी को स्थानीय पहचान से जोड़ने का काम कर रहे हैं।

इस सृजन की खास बात यह है कि मुजफ्फरपुर के विभिन्न धार्मिक स्थलों की पवित्र मिट्टी के साथ खुदीराम बोस की धरती की मिट्टी को मिलाकर भी कई कृतियां तैयार की जा रही हैं। इन पर लीची की आकृतियों और स्थानीय संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।

प्रहलाद पंडित की ये कृतियां मिट्टी के पारंपरिक शिल्प को लीची की पहचान से जोड़ती हैं। एक ओर इनमें स्थानीय कला और आस्था की झलक दिखाई देती है, तो दूसरी ओर लीची के पेड़ों और बागों के संरक्षण का संदेश भी सामने आता है।

‘लीचीपुरम’ की अवधारणा का उद्देश्य स्थानीय मिट्टी, स्थानीय कलाकार और मुजफ्फरपुर की स्थानीय पहचान को एक साथ लाकर ऐसी रचनात्मक पहल को आगे बढ़ाना है, जिससे शहर की लीची की पहचान नई पीढ़ी तक भी पहुंच सके। ‘Local Pride, Global Ride’ की भावना के साथ यह पहल मुजफ्फरपुर की पहचान को मिट्टी की कलाकृतियों के जरिए एक अलग अंदाज में प्रस्तुत कर रही है।

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