मुजफ्फरपुर: शरद पूर्णिमा के अवसर पर रविवार को शहर के गोला रोड स्थित वीणा आश्रम, राम भजन बाजार में कौमुदी काव्य कला केंद्र की ओर से कौमुदी महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। साहित्य, संगीत, काव्य और नृत्य को समर्पित इस समारोह में भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं की झलक देखने को मिली।


कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. पुष्पा प्रसाद ने की। समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन और सुरंगमा कला केंद्र के प्रशिक्षु छात्र-छात्राओं द्वारा प्रस्तुत गुरु वंदना से हुआ। उनकी प्रस्तुति ने वातावरण को भक्तिमय और सांस्कृतिक रंगों से सराबोर कर दिया।


महोत्सव में प्रसिद्ध कवि गोपालदास नीरज की कालजयी कविता ‘कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे’ का डॉ. अरुण शाह ने भावपूर्ण पाठ किया। कविता की पंक्तियों ने श्रोताओं को जीवन की सच्चाइयों, टूटते सपनों और गुजरते समय के महत्व का एहसास कराया। ‘स्वप्न झरे फूल-से, मीत चुभे शूल-से’ और ‘नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई’ जैसी पंक्तियों ने उपस्थित लोगों को भावविभोर कर दिया। कविता के माध्यम से समय की कीमत समझने, अवसरों को पहचानने और जीवन में कर्म के महत्व का संदेश दिया गया।


कौमुदी काव्य कला केंद्र के संस्थापक केदारनाथ प्रसाद ने कहा कि साहित्य, संगीत, काव्य और नृत्य हमारी सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण अंग हैं। इन कलाओं को संरक्षित करना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना समाज की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों से साहित्यिक चेतना का विकास होता है और युवाओं को भारतीय परंपराओं, जीवन मूल्यों तथा रचनात्मक अभिव्यक्ति से जुड़ने का अवसर मिलता है। कला और साहित्य समाज को संवेदनशील बनाने के साथ-साथ आपसी सद्भाव और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।


समारोह में शरद पूर्णिमा को आनंद, उपासना और सांस्कृतिक चेतना का पर्व बताते हुए साहित्य एवं कला के माध्यम से सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्यों को सशक्त बनाने पर जोर दिया गया। कार्यक्रम में बज्जिकांचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और क्षेत्र में साहित्यिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने का संकल्प भी दिखाई दिया।


इस अवसर पर डॉ. अरुण शाह, ब्रजेश कुमार, उदय नारायण सिंह, प्रो. प्रमोद नारायण मिश्र, अनीत कुमार यादव, राजेन्द्र प्रो. सिंह, अब्दुल लाल खां, गोपाल जी भारतीय, मायाशंकर प्रसाद, सुनील कुमार सिंह, मुस्कान केसरी, जगद शर्मा, कठपुतली कलाकार सुनील कुमार,

डॉ. ओम कुमार तिवारी, डॉ. देवव्रत अकेला, कृष्ण किशोर और अब्दुल मजीद सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि साहित्य, संगीत और कला केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि समाज की पहचान और सांस्कृतिक चेतना को जीवंत रखने के सशक्त माध्यम हैं।