सावन का पवित्र महीना चल रहा है। हर तरफ भगवान शिव की पूजा अर्चना हर्षोल्लास के साथ चल रही है। कई मंदिरों पर मेले लगे हैं और पूजन अर्चन का कार्य चल रहा है। भक्तों द्वारा कांवर को लेकर भारी तैयारियां देखने को मिल रही हैं। आपको बता दें कि कानपुर देहात में कई ऐसे ऐतिहासिक मंदिर हैं, जो अपने आप में इतिहास को समेटे हुए हैं। रसूलाबाद तहसील क्षेत्र के भीखदेव कहिंजरी में भगवान शंकर का महाकालेश्वर ऐसा मंदिर हैं जो अपने आप में एक अदभुत मंदिर है। बताया जाता है कि यह स्वयं स्थापित मंदिर है।

जिसका उल्लेख पुराणों में भी किया गया है।स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां किले पर रहने वाले एक राजा गंगा सिंह गौर का महल था। राजा के सिपाही बाणेश्वर शिव मंदिर बानीपारा के पास से बैलगाड़ी द्वारा आकर्षक शिवलिंग को लेकर जा रहे थे। जैसे ही उनकी बैलगाड़ी भीखदेव कहिंजरी के पास पहुंची तो बैलगाड़ी का पहिया टूट गया। इससे बैलगाड़ी आगे नही बढ़ सकी। इसके बाद राजा ने सिपाहियों को शिवलिंग हाथों से उठाकर लाने का आदेश दिया। सैनिकों ने भरसक प्रयास किया, लेकिन शिवलिंग वहां से टस से मस नहीं हुआ। जब शिवलिंग उस स्थान से हटा नहीं तो राजा के सिपाहियों ने शिवलिंग वहीं छोड़ दिया और वापस राजा के महल पहुंच गए।

काफी वर्षों तक शिवलिंग भीखदेव के पास जंगलों में ऐसे ही रखा हुआ जमीन में गड़ गया. इसके बाद करीब 1954 के आसपास तत्कालीन ग्राम प्रधान ने शिवलिंग को देखा तो इसकी जानकारी की। इस पर उन्होंने शिवलिंग को वहीं स्थापित करा दिया। जिसके बाद निरंतर उस शिवलिंग की पूजा अर्चना होने लगी। धीरे-धीरे महाकालेश्वर मंदिर का सुन्दरीकरण हुआ। आज यह शिवस्थल दूर दराज में आस्था व विश्वास का प्रतीक बना हुआ है। यहां के लोगों का मानना है कि यह मंदिर बहुत प्राचीन है और आज भी रात्रि के समय में इस मंदिर में नाग और नागिन का जोड़ा आकर भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग के आसपास भ्रमण करता है। लोग बताते हैं कि यह जोड़ा अक्सर सावन मास में निकलता है।

