पं. बंगाल के सियासी ‘खेला’ में ममता की चौतरफा घेरेबंदी की अंतर्कथा

सारःजम्मूकश्मीर, असम के बाद अब मिशन सोनार बांग्ला का संकल्प।कोरोना और याश तूफान की तबाही के बीच केंद्रराज्य का यह टकराव बंगाल हित में नहीं।

हरि वर्मा

पश्चिम बंगाल में सियासीखेलाजारी है। याश के बाद उठे ताजा बवंडर की अंतर्कथा आने वाले तूफान की ओर इशारा करती है। 2 मई को चुनावी नतीजे में एक तरफ ममता बनर्जी खुद नंदीग्राम सीट हार गईं तो दूसरी तरफ उन्होंने बंगाल का रण पहले से भी ज्यादा मजबूती से जीत लिया। कमोबेश यही स्थिति भारतीय जनता पार्टी की रही। बंगाल का रण भाजपा हार गई लेकिन तीन दशक तक कांग्रेस और 34 साल तक वामपंथियों के गढ़ में बेहद मजबूत पकड़ बनाली। वहां कांग्रेस वाम दलों का तो सियासी सूपड़ा तक साफ हो गया। ऐसे में मैदान में अब तृणमूल कांग्रेस और भाजपा आमनेसामने है। सियासी पंडित मानते हैं कि भाजपा पश्चिम बंगाल में अभी से 2026 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई है। कुछ जानकार मानते हैं कि 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी की यह चौतरफा घेरेबंदी है। हालांकि, कोरोना और याश तूफान की तबाही के बीच केंद्रराज्य का यह टकराव बंगाल हित में वाजिब नहीं है। बंगाल के लोगों के हित में केंद्र और राज्य को एकदूसरे का साथ देकर संकट से उबरने का यह वक्त है।

बारबार चक्रवात

बंगाल चुनाव नतीजे के बाद से वहां चक्रवात जारी है। नतीजे के साथ दो दिन तक वहां कई इलाकों में हिंसा हुई। जीत से उत्साहित तृणमूल कार्यकर्ताओं ने भाजपासंघ के कार्यकर्ताओं समर्थितों को निशाना बनाया। तृणमूलभाजपा समर्थक भिड़ें। घरों पर बुलडोजर चलाए गए तो हैंडपंप उखाड़ दिए गए। भाजपाइयों का पलायन हुआ। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, राज्यपाल जगदीप धनखड़, केंद्रीय गृह मंत्रालय के अलावा राष्ट्रीय बाल, महिला, अनुसूचित जाति, जनजाति आयोग की टीमों ने प्रभावित क्षेत्रों का जायजा लिया। केंद्र को रिपोर्ट सौंपी। ममता के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों के अलावा भाजपा ने मोर्चा खोल दिया। भाजपा के जीते विधायकों को केंद्रीय सुरक्षा प्रदान की गई ताकि वे अपने समर्थकों तक पहुंचकर उनके हौंसले बढ़ाएं। जब हिंसा पीड़ितों की शिकायतें बंगाल पुलिस ने अनसुनी कर दी, तो अदालत का दरवाजा खटखटाया गया। सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक वहां के तीन मामले पहुंचे। बंगाल हिंसा की सीबीआई जांच की मांग, हिंसा पीड़ितों के पुनर्वास और नारद स्टिंग से जुड़ा मामला। सुप्रीम कोर्ट से होकर ये मामले फिर कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंच गए। नारद स्टिंग मामले में ममता सरकार के मंत्रियों समेत आरोपी सभी चार तृणमूल नेताओं को हाईकोर्ट से जमानत मिल गई। 31 मई को जब मुख्य सचिव अलापन बंद्योपाध्याय का विवाद गहराया, उसी दिन कलकत्ता हाईकोर्ट ने बंगाल हिंसा के पीड़ितों के पुनर्वास के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित करने का आदेश दिया। इसमें मानवाधिकार आयोग के केंद्र राज्य के एकएक सदस्य शामिल हैं। यानी चुनाव बाद की सियासी लड़ाई बंगाल की जमीन से अदालत की चौखट तक जारी है। अब यह टकराव केंद्र बनाम राज्य सरकार का रूप ले चुका है।

तूफान तो आना है

याश तूफान तो टल गया लेकिन तूफान का जायजा लेने पहुंचे पीएम नरेंद्र मोदी की अनदेखी से सियासी भूचाल गया। मुख्य सचिव अलापन बंद्योपाध्याय को 31 मई को केंद्र में रिपोर्ट करने के बजाय ममता बनर्जी ने इस्तीफा दिलाकर उन्हें अपना सलाहकार बना लिया। हालांकि ममता बनर्जी के आग्रह पत्र पर ही केंद्र ने उन्हें तीन महीने का सेवा विस्तार दिया था वरना यूं भी 31 मई ही कार्यकाल का उनका अंतिम दिन होता। अलापन के इस्तीफे के बाद अब केंद्र ने फिर से अलापन को 1 जून को दिल्ली तलब किया है। यह घटनाक्रम केंद्र बनाम राज्य, ममता बनाम मोदी संघीय ढांचा विवाद का संकेत है। सरकार गठन के अभी एक महीने भी पूरे नहीं हो पाए है कि चौतरफा टकराव की पृष्ठभूमि तैयार है। जाहिर हैअब बंद्योपाध्याय केंद्रीय सेवा से मुक्त हैं, सो वह भी अदालत प्रशासनिक अधिकारी संगठन के मंच का सहारा ले सकते हैं। फिर से दिल्ली बुलाए जाने की अनदेखी का उनके सर्विस बुक को प्रभावित कर सकता है।केंद्र भारतीय सेवा के अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति नियमों के तहत आगे की कार्रवाई कर सकता है।

किस्सा कुर्सी अतीत का

बंगाल में करीब तीन दशक तक कांग्रेस का राजकाज रहा। वाम राजकाज भी 34 साल तक। बंगाल में कुर्सी की खातिर हिंसा का अतीत भी रहा है। तब विधानसभा में खुद पूर्व सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य का बयान रिकार्ड है कि हिंसा में वहां 28 हजार लोग मारे गए थे। यानी औसतन रोजाना 4 और महीने में करीब सवा सौ लोग हिंसा के शिकार हुए। सोनार बांग्ला, माटीमानुष के नारे के साथ ममता बनर्जी सत्ता में पहुंचीं। इस बार उनकी हैट्रिक है। भाजपा ने पहली बार 2015 में वहां रामनवमी पर राष्ट्रीय स्वाभिमान का अलख जगाया। तीन सीटों से आज 75 तक पहुंची है। इस नतीजे पर बंगाल का जिम्मा संभालने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर की दलील है कि सत्ता परिवर्तन की उम्मीद थी लेकिन तुष्टिकरण और करीब एक करोड़ वैसे बांग्लादेशियों ने नतीजे को प्रभावित किया जो आधार, मतदाता कार्ड की बदौलत वहां सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाते हैं। हालांकि संघ इस नतीजे को भी सकारात्मक मानता है क्योंकि 292 सीटों में से एक पर भी भाजपा उम्मीदवार की जमानत जब्त नहीं हुई। 68 अनुसूचित जाति वाले विधानसभा क्षेत्रों में से 34 और जनजाति वाले 16 में से 9 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा ने जीत हासिल की। इसके उलट 30 और 34 साल तक शासन करने वाली कांग्रेस और वामदल इस बार पूरी तरह से निपट गए।

जम्मूकश्मीर, असम के बाद सोनार बांग्ला की बारी

नतीजे से उत्साहित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बंगाल के बाहर पहुंचकर बंगाल के लिए जमीन तैयार करना शुरू कर दिया है। बंगाल प्रभारी सह सरकार्यवाह रामदत्त इसी 24 मई को नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ प्रांत के संघ प्रचारकों के साथ वेबिनार से जुड़े। हिंसा प्रभावित जम्मूकश्मीर और असम में शांति और विकास के बाद अब मिशन सोनार बांग्ला साकार करने का संकल्प दोहराया। उन्होंने इन क्षेत्रो से भी संघ प्रचारकोंकार्यकर्ताओं को बंगाल पहुंचकर वास्तुहारा शांति सहयोग का लक्ष्य रखा। उनका कहना था कि सोनार बांग्ला साकार होने तक पग की ग‌ति थमेगी नहीं। केंद्र सरकार अपना काम कर रही है, कानून अपना काम कर रहा है और भाजपासंघ अपना काम। जाहिर है ममता को घेरने की यह चौतरफा रणनीति है। ऐसे में इस पर नजर टिकी है कि बंगाल में कब और कैसे कमल खिल पाता है। वैसे, पहले से भी ज्यादा मजबूती से उभरी ममता दीदी की कुर्सी हिलाना फिलहाल इतना आसान भी नहीं है। सो पश्चिम बंगाल मेंखेलाजारी है। बेहतर तो यह रहता कि केंद्रराज्य जनहित में कोरोनायाश की तबाही से मिलकर लड़ते और उबरते।

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Discover more from Muzaffarpur News

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading