मुजफ्फरपुर। बोचहां सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र के लिए हो रहे उपचुनाव ने राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई। पिछले दो दिनों की हलचल ने इसे और रोचक बना दिया है। यूं तो बिहार की राजनीति पर नजदीक से नजर रखने वालों के लिए यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन राज्य के बाहर के राजनीतिक जानकारों को ये सब चीजें चौंका सकती हैं।

उन्हें लग सकता है कि क्या एक सीट के लिए होने वाले उपचुनाव में भी इस स्तर की राजनीति की जरूरत है, किंतु इस घटनाक्रम के पीछे के कारणों का विश्लेषण करने पर इस बात को समझना सरल हो जाएगा कि एक सीट के लिए भी इस स्तर की मारामारी क्यों है?

उससे भी आगे बढ़कर देखें तो यह केवल एक उपचुनाव मात्र नहीं है। इसके परिणाम से कुछ नेताओं के राजनीतिक भविष्य का फैसला होना है। गठबंधन का स्वरूप तय होना है। यह चुनाव विरासत की लड़ाई भी है। दो वर्ष पहले हुए चुनाव में जो मुख्य प्रतिद्वंद्वी नेता थे अब उनकी जगह उनकी अगली पीढ़ी मैदान में है। दोनों के दल बदल गए हैं।

दिवंगत वीआइपी विधायक मुसाफिर पासवान के पुत्र अमर पासवान राजद के उम्मीदवार हैं। दूसरी ओर राजद से पिछली बार मैदान में उतरे पूर्व मंत्री रमई राम की पुत्री गीता देवी वीआइपी के साथ हैं। भाजपा ने पूर्व विधायक बेबी कुमारी को टिकट दिया है। उम्मीद है कि बुधवार को कई नामांकन होंगे। इसमें विभिन्न दल अपनी ताकत का एहसास कराएंगे।

इसमें उम्मीदवारों के साथ पार्टियों के बड़े नेताओं की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में बेबी ने यहां से नौ बार विधायक रहे रमई राम को वर्ष 2015 में हराया था। पिछले चुनाव में एनडीए से वीआइपी को सीट मिलने के बाद वह मैदान से बाहर रहीं।
इस बार उनकी उम्मीदवारी में सांसद अजय निषाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस कारण उनकी प्रतिष्ठा जुड़ गई है। दूसरी ओर मुसाफिर पासवान की विरासत संभालने उतरे अमर पासवान ने अंतिम समय में नाव छोड़ लालटेन थामा है।

उनकी उम्मीदवारी पर राजद के शीर्ष नेतृत्व की प्रतिष्ठा दांव पर रहेगी। पिछले पांच दशक में पहली बार ऐसा होगा कि रमई राम बोचहां सीट से सीधे उम्मीदवार नहीं होंगे। इस उपचुनाव में गीता देवी जरूर उम्मीदवार हैं, पर प्रतिष्ठा रमई की ही जुड़ी है।
