बेतिया । चनपटिया के वार्ड नौ निवासी एमएस साहिल अनाज के दानों पर पेंटिंग बनाते हैं। चावल, मसूर, तीसी और सरसों के दानों पर अपनी हुनर को आकार देते हैं। करीब 50 वर्ष से इस कला को जी रहे साहिल इसे आगे बढ़ाने में लगे हैं। इसका निशुल्क प्रशिक्षण बच्चों को दे रहे हैं। 65 वर्षीय साहिल को बचपन से ही चित्रकारी पसंद थी। लखनऊ के अमीनाबाग में तीन साल तक इसका प्रशिक्षण लिया।
इसके बाद इस सोच के साथ घर लौट आए कि गृहक्षेत्र में इसका प्रसार करेंगे, लेकिन यहां के लोगों को उनकी चित्रकारी समझ में ही नहीं आई। आजीविका के लिए वे साइन बोर्ड और वाल पेंटिंग का काम करने लगे। वे मसूर के दानों पर भारत का मानचित्र, इंडिया गेट, कुतुबमीनार, संसद भवन, राष्ट्रीय ध्वज, सरसों पर अंग्रेजी के अल्फाबेट्स और चावल के दानों पर ताजमहल बना चुके हैं। तीसी के दाने पर भगवान बुद्ध का चित्र उकेरते हैं। पीपल के पत्ते के रेशे से भगवान बुद्ध, ब्रश और चाकू की मदद से घर, पहाड़, नदी, झरना, पेड़ आदि की कलाकृति बना चुके हैं।
महीन दानों पर पेंटिंग बनाने से पहले उनपर कवर पेंट करते हैं। इसके बाद आकृति को चाकू, नुकीली वस्तु और ट्यूब कलर से तैयार करते हैं। एक कलाकृति बनाने में कई दिन लगते हैं।
इन सूक्ष्म कलाकृतियों को नंगी आंखों से देख पाना संभव नहीं। इसके लिए मैग्निफाइंग ग्लास इस्तेमाल करते हैं। इनकी अद्भुत कलाकृति को देखने के लिए नेत्र विशेषज्ञ डा. प्रदीप कुमार ने सहयोग के तौर पर दो दर्जन लेंस दिए हैं।
कला के प्रसार के लिए जिले के वृंदावन आश्रम में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने प्रदर्शनी लगाई। वहां मौजूद अधिकारी और जनप्रतिनिधि ने प्रशंसा भी की। 1980 में जिला परिषद में उनकी इस कलाकृति के लिए सम्मानित भी किया गया।
वे आठ स्कूली बच्चों प्रतीक कुमार, अयान, रहमान, कुंदन कुमार, उजाला, शाहबान, रोजी खातून, अहिल और अनूप को इस कला का निशुल्क प्रशिक्षण दे रहे हैं। प्रतीक का कहना है कि पेंटिंग बनाना थोड़ा कठिन जरूर है, लेकिन तैयार होने पर देखकर मन मुग्ध हो जाता है। रोजी खातून ने बताया कि स्कूली शिक्षा बाधित नहीं हो, इसलिए सप्ताह में एक दिन प्रशिक्षण लेने आती हूं।
