बिहार में काली पूजा आज ही है. कई दिन पहले से इसकी तैयारी की जा रही थी. बता दें कि बंगाल में दीपावली के दिन ही काली पूजा की जाती है. यही वजह है कि मुजफ्फरपुर में भी बंगाली समाज आज के दिन ही काली पूजा करता है. मुजफ्फरपुर के हरीसभा चौक पर बंगाली समाज के लोग 121 वर्ष से पूजा रहते आ रहे हैं. यहां दक्षिणा काली के स्वरूप की पूजा होती है. जिसे श्यामा काली भी कहते हैं.
हरिसभा दुर्गा पूजा कमेटी के विजय कुमार दास बताते हैं कि बंगाल में कार्तिक मास के अमावस को काली पूजा की परंपरा है. हमारा समाज उसी परंपरा को मुजफ्फरपुर में वर्ष 1902 से निभाता आ रहा है. हरिसभा दुर्गा पूजा कमेटी की स्थापना 1902 में ही हुई, तब से आज तक यह पूजा कमेटी मुजफ्फरपुर में काली पूजा करती आई है.
सीस कोहड़ा, गागर नींबू और गन्ने की बलि
देवी उपासक प्रोभाल ने बताया की इस पूजा में वे माता काली के दक्षिणा काली के स्वरूप की पूजा करते हैं. जिसे श्यामा काली भी कहते हैं. माता की इस प्रतिमा में उनका दाहिना पैर भगवान शंकर की छाती पर रहता है. मां काली की पूजा करने के लिए बलि का विधान है. बलि के बिना माता की पूजा पूर्ण नहीं हो सकती है. इस पूजा में हरिसभा दुर्गा पूजा कमेटी द्वारा सीस कोहड़ा, गागर नींबू और गन्ने की बलि दी जाती है.
बोलपुर का प्रसिद्ध ढाक मुजफ्फरपुर में
हरिसभा दुर्गा पूजा कमेटी ने इस बार कोलकाता के बोलपुर का प्रसिद्ध ढाक मुजफ्फरपुर में बुलाया है. आज होनेवाली पूजा के पश्चात ढाक बजाकर मां काली की आरती होगी. इस साल यहां माता की प्रतिमा पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के प्रसिद्ध मूर्तिकार झंटू पाल ने बनाई है. हरिसभा दुर्गा पूजा कमेटी के पुजारी सुकांत बनर्जी पिछले 20 साल से पूजा कराते आ रहे हैं. सुकांत बनर्जी मुजफ्फरपुर में भी पूरे बंगाली रिवाज से पूजा कराते हैं. बंगाली समाज द्वारा आयोजित होने वाली यह पूजा मुजफ्फरपुर में बेहद प्रसिद्ध है.


