कमबख्त इश्क ने कहीं का न छोड़ा, मैडम के लिए कुछ ऐसे ही माथा पीट रहे साहब

भागलपुर : प्यार तो कभी किसी से हो सकता है। प्यार एकतरफा हो तो मुश्किल होती है। दरअसल, प्रखंड में तैनात एक साहब को एक मैडम से इश्क हो गया। इश्क भी ऐसा साहब मैडम को जीवन संगिनी बनाने को तैयार थे, पर मैडम ने कोई भाव ही नहीं दिया। साहब, मैडम को रिझाने के लिए लगातार सेवा टहल में लगे रहते थे, ताकि मैडम कभी उनकी भावना को समझ सकें। मैडम ने साहब की भावना को नहीं समझा। साहब अपनी पूरी उर्जा किस तरह लगा रहे थे। साहब के विभाग के कर्मचारी उनकी भावना को समझ गए थे। हालात तो यह थे कि यदाकदा मैडम कभी प्रखंड में आ गई तब साहब उनकी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ते थे। कुछ दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा। एक दिन साहब को पता चला कि जिसे वह संगिनी बनाने की सोच रहे थे वो तो किसी और की संगिनी बनने तैयार हैं।

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उच्च शिक्षा से जुड़े एक साहब काफी कड़क मिजाज है। हाल में उनका तबादला दूसरे प्रदेश में हो गया है, लेकिन साहब यहीं पर जमे हुए है। इधर साहब के विरोधी हर रोज इंतजार कर रहे हैं कि कब वह यहां से जाएंगे। कुछेक विरोधी तो मन्नत तक मांग रहे हैं। मजेदार तो यह है कि जो साहब के साथ दिन रात रहते हैं वो भी अंदरखाने से यहीं चाहते हैं कि वे चले जाएं। ताकि फिर से उनकी दुकान संस्थान में चल सके। इधर, साहब भी लंगड़ लगाएं हुए हैं कि उन्हें यहां से न जाना पड़े। दरअसल, साहब ने यहां बने रहने के लिए अपनी अर्जी लगा रखी है। जल्द ही अर्जी पर सुनवाई होने वाली है। जब तक अर्जी पर सुनवाई नहीं हो रही है तब तक साहब यहीं पर बने रहेंगे। साहब के यहां से चले जाने के लिए कुछ लोग तो पूजा-पाठ भी करा रहे हैं।

काजल की कोठरी से बेदाग

काजल की कोठरी से बेदाग कैसे निकला जा सकता है यह साहब के ओएसडी रहे उनसे सीखा जा सकता है। ओएसडी साहब के मूल विभाग में एक से एक बड़ा कारनामा हुआ। उनके कार्यकाल में ही विभाग के छह लोग जाम टकराते पकड़े गए। बात यहीं समाप्त नहीं हुई। इस घटना के कुछ ही दिन बाद एक बड़े बाबू सुविधा शुल्क से साथ पकड़े गए। पर साहब बेदाग रहे। साहब पर इसलिए उंगली नहीं उठी क्योंकि वह बड़के साहब के ओएसडी थे। फिलहाल ओएसडी साहब का परवाना कट गया है। अब वह दूूसरे जिले में लोगों की समस्याएं सुनेंगे और सुलझाएंगे। साहब का परवाना भले ही कट गया लेकिन उनको लेकर चर्चा आज भी विभाग में जिंदा है। जब कभी कोई कर्मचारी दूसरे विभाग का भी दंडित होता है तो साहब की चर्चा कर्मचारियों में शुरु हो जाती है। जब उनके मूल विभाग में कारनामा हुआ तो वो कैसे पाक साफ रह गए।

साहब कुछ तो बोलते हैं

साफ सफाई वाले विभाग के साहब इन दिनों हर चौक चौराहे पर चलने वाले टेलीविजन पर कुछ बोलते दिखते हैं, लेकिन टेलीविजन में कोई आवाज न होने के कारण देखने से लगता है। बस साहब कुछ बोल रहे हैं। साहब को देखकर समझा जा सकता है कि अपने विभाग के अच्छे काम के बारे में बोल रहे होंगे। जिसे सुना नहीं बस देखा जा सकता है। वैसे, चौराहे पर लगे टेलीविजन में कभी-कभी स्मार्ट सिटी जैसे कुछ दिखता है, लेकिन कुछ देर तक टीवी देखने के बाद धरातल पर स्मार्ट सिटी जैसा कुछ भी नहीं दिखता। शहर के चारों तरफ वर्ष भर से खोदी जा रही सड़के। जाम में फंसी गाड़ियां और उनके कान फोड़ू भोंपू की आवाज सुनाई देती है। अब तो सपने जैसा हो गया है स्मार्ट सिटी। अब तक यहां के लोगों को स्मार्ट सिटी के नाम पर खोदी गई सड़क ही देखने को मिली है।

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