हिमालय की गोद में बसा नेपाल एक बार फिर दहल उठा है। इस बार आफत आसमान से नहीं, उत्तर की बर्फीली चोटियों से आई है। 27 अगस्त 2026,बुधवार को जब रसुवा जिले के तिमुरे और स्याफ्रुबेसी के लोग अपनी दुकानें खोलने की तैयारी कर रहे थे, तब उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि अगले कुछ मिनटों में सब कुछ खत्म हो जाएगा। सुबह करीब नौ बजे एक भयानक गड़गड़ाहट के साथ भोटे कोशी नदी में मटमैले पानी का ऐसा रेला आया जिसमें बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े, पत्थर, पेड़ और मलबा भरा था। देखते ही देखते नदी ने अपना किनारा छोड़ दिया और पूरे बाजार को अपने आगोश में ले लिया। प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि पानी की ऊंचाई पंद्रह से बीस फीट तक बढ़ गई थी। नेपाल और चीन को जोड़ने वाला मुख्य पुल, जिसे मितेरी पुल कहा जाता है, ताश के पत्तों की तरह बह गया।

सीमा पर बना पाँच मंजिला चीनी इमिग्रेशन सेंटर, कस्टम कार्यालय, दर्जनों ट्रक और कंटेनर पानी में कागज की नाव की तरह बहते नजर आए। रसुवागढ़ी में बन रहा एक सौ ग्यारह मेगावाट का हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट, जिसे दोनों देशों की दोस्ती की निशानी माना जाता था, बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। वहीं पासंग से ल्हामू तक जाने वाला हाईवे कई जगह से टूट गया है, जिसके कारण रसुवागढ़ी तक अब कोई गाड़ी नहीं जा सकती। खबर लिखे जाने तक सैंकड़ो शव निकाले जा चुके हैं और सैंकड़ो लोग लापता हैं जिनमें सात पुलिसकर्मी, सैंकड़ो आम नेपाली और दर्जनों चीनी नागरिक शामिल हैं। नेपाल सरकार ने पाँच जिलों में हाई अलर्ट जारी कर सेना, सशस्त्र पुलिस और नेपाल पुलिस को बचाव कार्य में लगा दिया है। हेलीकॉप्टरों से लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुँचाया जा रहा है।

अब सवाल उठता है कि आखिर ये बाढ़ आई क्यों, जबकि नेपाल में उस दिन भारी बारिश भी नहीं हुई थी। वैज्ञानिक इसे ग्लेशियर झील के फटने से आई बाढ़ यानी जीएलओएफ कह रहे हैं। असल में कुछ दिन पहले तिब्बत की ऊँचाई पर एक बड़ा हिमस्खलन हुआ था। इस हिमस्खलन ने ल्हेन्डे खोला नदी के मुहाने को बंद कर दिया और पीछे एक विशाल अस्थायी झील बन गई। बुधवार सुबह तिब्बत में चार दशमलव चार तीव्रता का भूकंप आया और बर्फ की वो कच्ची दीवार उस झटके को सह नहीं पाई। करोड़ों लीटर रुका हुआ पानी एक साथ छूट गया और सीधे नेपाल की तरफ दौड़ पड़ा। तिब्बत की तरफ कोई चेतावनी प्रणाली नहीं होने से नेपाल को संभलने का एक मिनट का भी मौका नहीं मिला।

यह घटना कोई नई नहीं है। पिछले साल जुलाई में भी इसी ल्हेन्डे खोला में ऐसी ही बाढ़ आई थी जिसमें अठारह लोग बह गए थे। हिमालय क्षेत्र में इस समय इक्कीस ऐसी खतरनाक झीलें चिन्हित की गई हैं जो कभी भी फट सकती हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और ऐसी अस्थायी झीलें हर साल बन रही हैं। हम विकास के नाम पर नदियों के बिल्कुल किनारे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट और सड़कें बना रहे हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि पहाड़ अपना हिसाब खुद रखता है।

भोटे कोशी नदी आगे चलकर त्रिशूली बनती है और फिर गंगा में मिल जाती है। इसलिए इसका असर अंततः बिहार और उत्तर प्रदेश तक जाता है। यह सैलाब सिर्फ नेपाल के लिए नहीं, पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक चेतावनी है। पहाड़ों को कंक्रीट से नहीं, सम्मान से बचाना होगा, वरना तिब्बत का एक छोटा सा हिमस्खलन कल काठमांडू और परसों पटना तक हाहाकार मचा सकता है।