‘मोदी है तो मुमकिन’ यह नारा किसने दिया था ? जानें…

अरुण जेटली यानी वर्षों तक भाजपा के संकटमोचक रहने वाले कुशल रणनीतिकार…। ऐसे नेता जिसे भाजपा और दूसरे दलों के बीच का सेतु माना जाता रहा हो। एक ऐसे नेता जिनके तर्क और युक्ति पर हर किसी को भरोसा हो। एक ऐसे नेता जो हास्य व्यंग्य के जरिये भी बहुत कुछ संदेश देते हों और सबसे बड़ी बात, एक ऐसे नेता जिनकी छांव में कार्यकर्ता आश्वस्त हों।

अरुण जेटली के निधन के साथ भाजपा के करोड़ों कार्यकर्ताओं के लिए वह छांव ख’त्म हो गई है। इसके साथ ही एक सेतु भी टूट गया है। छात्र राजनीति से आकर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचे जेटली अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में सरकार में आए तो सूचना प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई थी।

दरअसल, उनकी सबसे बड़ी खूबी थी संवाद। कानून की पढ़ाई ने उन्हें तार्किक तो बनाया ही था, सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहने के कारण उनका संवाद सामने वाले व्यक्ति को भरोसा दिलाता था। अपनी क्षमता के कारण उन्होंने कानून, वाणिज्य, वित्त जैसे बड़े मंत्रालयों को बखूबी चलाया था। जीएसटी जैसे बड़े सुधार भी उनके ही काल में हुए थे।

भाजपा के लिहाज से देखा जाए तो उनकी भूमिका संगठन में बहुत बड़ी थी। वह कभी चुनावी अखाड़े के विजेता नहीं रहे। सिर्फ एक बार लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन बाजी नहीं मा’र पाए। लगातार राज्यसभा में आते रहे, लेकिन चुनावी बिसात पर रणनीति खूब जमाते थे। वह अरसे तक गुजरात के प्रभारी रहे। चुनावी जीत दिलाने का रिकॉर्ड कुछ ऐसा रहा कि एक बार जब दिल्ली में चुनाव होने थे तो भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री दावेदार उनसे सिर्फ यह आग्रह करने पहुंचे थे कि दिल्ली का प्रभार वही ले लें, ताकि जीत सुनिश्चित हो सके। 2019 लोकसभा चुनाव में भी प्रचार अभियान की जिम्मेदारी जेटली को ही सौंपी गई थी।

‘मोदी है तो मुमकिन है’ का दिया था नारा

‘मोदी है तो मुमकिन है’ जैसे नारे भी उनकी कमेटी ने ही दिए थे। बिहार में भाजपा के विकास और जदयू के साथ तालमेल में उनकी अहम भूमिका रही। फिलहाल यह कहा जा सकता है कि जेटली के बाद पार्टी में ऐसा कोई नेता नहीं बचा है, जिसका अधिकतर दलों के नेताओं के साथ वह तालमेल रहा हो जितना जेटली के साथ था। दरअसल, वह मध्यम मार्ग के समर्थक थे। भाजपा की विचारधारा के प्रति संकल्प के बावजूद उनका उदारवादी चेहरा सामंजस्य बनाने में मदद करता था।

संसद में अपनी प्रखरता के कारण वह विरोधी दलों को कठघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे, लेकिन जब व्यक्तिगत दोस्ती की बात आती थी, तब वह उनके साथ खड़े दिखते थे। वाजपेयी काल से लेकर मोदी काल तक के दो दशक में एक दशक तो संघर्ष में बीता। वह काल भाजपा के लिए कठिन था, लेकिन दूसरे नेताओं के साथ-साथ अरुण जेटली की प्रखरता ने भाजपा कार्यकर्ताओं में निराशा नहीं आने दी थी।

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