अब एक मात्र यही है सहारा, याद आ रहा है माँ के हाथ का खाना

त्योहारों के इन मौसम में जहाँ सभी अपने परिवार व दोस्तो के साथ रहना पसंद करते है वही कुछ बच्चे बड़ी-बड़ी डिग्री, नौकरी और पढ़ाई के लिए अपने घर से दूर चले जाते है। त्योहार के मौके पर भी सबकुछ भूलकर कुछ कर दिखाने के लिए अपने परिवार व घर से दूर रहना उनकी मजबूरी बन जाती है। जहाँ दूसरे अपने परिवार के साथ त्योहारों में रहकर हर्षोल्लास के साथ पर्व मनाते है वही कुछ बच्चे मंजिल की चाह में घर से दूर रहकर मायुष रहते है।

एक पल को घर की यादों को भुलाया भी जा सकता है लेकिन घर की सबसे ज्यादा याद दिलाने वाली चीज माँ के हाथ का खाना होता है। माँ के हाथ जैसा स्वाद उन्हें बाजार में भी नही मिलता, क्योंकि बाजार में बिकने वाले खाने का उद्देश्य पैसा कमाना होता है जिस कारण वे लोग खाना बनाने में कई-कई दिन की रखी सब्ज़ियों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि घर मे माँ अपने बच्चों के स्वास्थ को ध्यान में रखते हुए पौष्टिक एवं ताज़ा खाना बनाती है। माँ के हाथ के बने खाने में प्यार के साथ-साथ ममता भी होता है, तभी वह स्वाद के साथ-साथ पौष्टिकता से भरपूर होता है।

बच्चे जब अपने घर से दूर पढ़ाई करने जातें है तब वह अधिकतम होस्टल में रहकर अपना भरण-पोषण करते है लेकिन जब पर्व के मौके पर होस्टल बन्द हो जातें है तब उनके सामने बाज़ार के खाने के अलावा कोई चारा नही बचता। उस समय पौष्टिक भोजन छोड़ कर एक समय का भरपूर खाना ही बहुत मुश्किल हो जाता है। तब एकमात्र बाजार का खाना ही उनके लिए सहारा बन पाता है।

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