कॉलेजियम बहाली संबंधी शीर्ष न्यायालय की व्यवस्था के आधार पर रविशंकर प्रसाद ने उठाए सवाल, जानें…

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को खारिज करने संबंधी उच्चतम न्यायालय के आदेश के आधार पर प्रश्न उठाते हुए शुक्रवार को कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इस बात पर हैरत जताई कि जब प्रधानमंत्री देश के परमाणु हथियार के प्रयोग को लेकर निर्णय कर सकते हैं तो उन पर निष्पक्ष न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर भरोसा क्यों नहीं किया जा सकता?

उच्चतम न्यायालय ने 2015 के एक फैसले में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को खारिज करते हुए उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली के जरिए करने की व्यवस्था को फिर से बहाल कर दिया था। खा’रिज किए गए कानून में न्यायिक नियुक्ति के मामले में कार्यपालिका को अधिक अधिकार दिए गए थे।

प्रसाद ने कहा कि सरकार उच्चतम न्यायालय के आदेश का सम्मान करती है किंतु वह इस कानून को खा’रिज करने के तर्क से संतुष्ट नहीं है। प्रसाद ने ‘कोविड-19 के उपरांत भारत के लिए कानूनी एवं डिजिटल चुनौतियां’ विषय पर प्रोफेसर एन आर माधव मेनन स्मृति व्याख्यान वीडियो के जरिए देते हुए कहा कि देश के 16 हजार से अधिक अदालतों के डिजिटलीकरण में सरकार का इससे संबंधित कार्यक्रम काफी उपयोगी साबित हुआ है।

रविशंकर प्रसाद (फाइल फोटो)

उन्होंने न्यायिक नियुक्ति आयोग के बारे में उच्चतम न्यायालय के आदेश का जिक्र करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि नियुक्ति आयोग में कानून मंत्री एक सदस्य है लिहाजा उस पद से की गई नियुक्ति तब निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ नहीं रहेगी जब सरकार के खि’लाफ मुकदमा आएगा। प्रसाद ने कहा, ‘यदि कानून मंत्री के महज शामिल होने से नियुक्ति की वस्तुनिष्ठा पर संदेह उठता हो तो यह एक बहतु ही वि’वादास्पद धारणा वाला सवाल है। हम सभी प्रधानमंत्री के प्रति जवाबदेह हैं क्योंकि वह सरकार के प्रमुख हैं।’

उन्होंने कहा, ‘भारत के लोग प्रधानमंत्री पर भारत की शुचिता, अखंडता और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए भरोसा करते हैं। आप सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री के पास परमाणु बटन होता है। प्रधानमंत्री पर देश की बहुत सारी चीजों के लिए काम करने का भरोसा किया जा सकता है किंतु कानून मंत्री की सहायता प्राप्त (की सहायता से काम करने) वाले प्रधानमंत्री पर निष्पक्ष एवं वस्तुनिष्ठ न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता।’

सोर्स : अमर उजाला

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