मुजफ्फरपुर की बात हो और खुदीराम बोस की चर्चा ना हो, भला ये कैसे हो सकता है. मीडिया रिपोर्ट्स के अलावा खुदीराम बोस की जीवनी पर अनेक शोधपत्र प्रकाशित हुए. खुदीराम बोस के कम उम्र में फांसी लगने के बाद कई लेखकों और प्रकाशकों ने उनके जीवन के कई पहलुओं को लोगों के सामने लाने की कोशिश की. लेकिन आज भी एक राज ऐसा है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. वो राज हम आपको बताएंगे. मुज न्यूज आपको बताएगा कि आखिर फांसी की रात मुजफ्फरपुर जेल में जेलर ने खुदीराम बोस के हाथों में क्या दिया था और जिसे देते वक्त उसकी आंखों में आंसू थे.

खुदीरामबोस सबसे कम उम्र में फांसी के फंद पर चढ़ने वाले क्रांतिकारियों में शुमार हैं. उन्होंने ब्रिटिश मैजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफर्ड को मारने का प्रयास किया था लेकिन गलती से किसी और को मार बैठे थे. इस आरोप में उनको फांसी की सजा हुई थी. शोधपत्रों के मुताबिक 11 अगस्त 1908 को तड़के सुबह खुदीराम बोस को फांसी दी जानी थी. घटना 10 अगस्त की रात की है. खुदीराम अपने सेल में बैठे हुए थे. उनके चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था. अचानक उन्हें जेल का जेलर आते हुए दिखा. खुदीराम के चेहरे पर थोड़ी मुस्कान आई.

कहते हैं कि जेलर को खुदीराम बोस से अपने बेटे की तरह लगाव हो गया था. जेलर खुदीराम से बहुत प्यार करते थे. जेलर ने प्यार से पहले खुदीराम को देखा और उसके बाद उनकी हथेली पर रात के वक्त चार रसीले आम रख दिए. जेलर की आंखों में आंसू थे. खुदीराम हथेली पर आम देखकर मुस्कुरा रहे थे. लेकिन जेलर को उस वक्त आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. जब तड़के सुबह खुदीराम को फांसी के लिए ले जाने के लिए आए, तो उन्होंने देखा कि आम वैसे के वैसे कोठरी में रखे हुए हैं.

खुदीराम बोस ने उस वक्त जेलर से ठिठोली करने के लिए पूरे आम को चूसकर खा लिया था और आम के छिलके को फुलाकर कोने में रख दिया था. जैसे ही जेलर ने आम उठाए उसके छिलके पिचक गए. उसके बाद खुदीराम जोर से हंसे और जेलर के साथ फांसी देने के लिए ले जाने आए सिपाही भी हंसने लगे.