मुजफ्फरपुर के लोगों के लिए ये खबर बहुत जरूरी है, हो जाइए सावधान !

वर्तमान में शार्टकट से सियासत में शीर्ष पर पहुंचने के आतुर कुछ कुंठित लोगों की टोली हमेशा नेताओं की चापलूसी में लगी रहती है. नेताओं को ये सुहाता है. आप चापलूसी से निकले चरमानंद वाली अनुभूति नेताओं के चेहरे पर कुटिल मुस्कान के रूप में देख सकते हैं. कुछ नेता क्षेत्र की तस्वीर भी इन्ही चापलूसों के चश्मे से देखते हैं. जमीन से जुड़ने की जहमत नहीं उठाते. गांव-गिरांव से दूर रहते हैं. चापलूस उनकी चंद सेल्फी और उद्घाटन वाली तस्वीरें फेसबुक पर पोस्ट करते हैं. अपने लफ्फुओं से लाइक और कमेंट दिलवाकर उनके अहम को तुष्ट करते हैं. महोदय भी इतने से संतुष्ट हो जाते हैं. चलो सब कुछ अच्छा है !

कभी-कभार महोदय के दौरे पर कोई बीच सभा में खड़ा होकर वास्तविक स्थिति बयां कर दे, तो इस चापलूस मंडली की पेट में मरोड़ उठने लगता है. वास्तविकता बयान करने वाले को ये धकेलकर पीछे कर देते हैं. फिर चवनिया मुस्की वाली चापलूसी से पगी सेल्फी लेकर नेताजी को संतुष्ट कर देते हैं. ज्यादात्तर नेताओं के परिजन भी इन्हीं चापलूसों से घिरे रहते हैं. उन्हें पता होता है कि हमारे क्षेत्र में अच्छे लोग भी अच्छी खासी संख्या में हैं. जिनसे बातचीत की जा सकती है. स्थिति को दुरुस्त किया जा सकता है. लेकिन, अपने अहंकार और ओछेपन से घिरे छिछोरे वैसे लोगों से बातचीत करने में कतराते रहते हैं.

उदाहरण के तौर पर किसी भी क्षेत्र को लीजिए. उस क्षेत्र के नेताओं के आस-पास चापलूसों का जमावड़ा है. इन चापलूसों ने उन्हें क्षेत्र की वर्तमान स्थिति से काफी दूर रखा है और ये दूरी कई बार भारी पड़ जाती है. चंद उद्घाटन और जीर्णोद्वार ही जनप्रतिनिधित्व नहीं होता ! जन- प्रतिनिधि पूरे पांच सालों के लिए उस क्षेत्र की जनता का अभिभावक होता है. उसे हर गांव, पंचायत और प्रखंड के इलाके को अपना परिवार समझकर चलना होता है ? चमचमाती गाड़ी से उतरने के बाद गले में चंद माला डालने वाले वोटिंग के दिन महोदय के पैसे से ही दारू पीकर सोये रहते हैं. वैसे में उन्हें वोट आम जनता जाकर देती है. और आम जन की भावना चापलूस सांसद के आस-पास भी पहुंचने नहीं देते.

नेताओं के आगे-पीछे डोलने वाले इन चापलूसों के उत्पति की कहानी बड़ी रोचक है. इनका लक्ष्य शार्टकट के जरिए सियासत साधने का होता है. ये विशेष चमड़ी के आवरण से लैस होते हैं. ये कुंठा, अहंकार और कुलीनता की ग्रंथि से तैयार होते हैं. अंदर से बेहद अहंकारी और ओछेपन का आवरण ओढ़े होते हैं. मैं ही सबसे सही हूं ! इस टाइप वाली मानसिकता से ग्रसित होते हैं. बेशर्म हंसी औऱ नेता के सामने हमेशा अच्छी नस्ल वाले जानवरों की तरह जीभ लपलपाते हैं. बेहयाई और बेशर्मी की कड़ाही में दुत्कार से बनी चाशनी चाटकर हमेशा मुस्कुराते रहते हैं. नेताओं की शान में हमेशा चापलूसी की डिक्शनरी से निकले जुमले और तारीफ के कसीदे पढ़ते हैं. सामने वाले को सच्चाई से दूर रखते हैं, ताकि उनकी पोल न खुले.

हमेशा नेता के सामने स्पाइनलेस ब्रांड के गमछे से हमेशा हितैषी होने की हवा खिलाते रहते हैं. नेताजी शिलान्यास कर दे, तो वे उसे पूर्णतया निर्माण बताते हैं और मनप्राण से महमहाते हुए उनकी शान में सियासत के सिरमौर होने की कविता पाठ करते हैं. हमेशा झक सफेद कुर्ता पजामा और नेताजी को जो पसंद हो उस वेषभूषा में रहते हैं. हालांकि शक्ल, रंगरूप और चालढाल आम लोगों की तरह होती है. अपनी हरकतों से हमेशा अपना परिचय देते हैं. उनमें झूठी तारीफ करने का सच्चा भाव समाहित होता है. शायद इसीलिए वर्षों पहले हरिशंकर परसाई चमचे की दिल्ली यात्रा लिख गए थे…नीचे उसका कुछ अंश है….

‘सबसे ज्यादा चमचे राजनीति के क्षेत्र के नेताओं के होते हैं. इतिहास साक्षी है कि दुनिया में जितनी उथल-पुथल हुई है, वह महापुरुषों के कारण नहीं बल्कि उनके चमचों के कारण हुई है. जब भी चमचे ने अपनी शक्ल से कुछ किया है, तभी उपद्रव हुए हैं. इसलिए हर बड़ा आदमी विश्वहित में इस बात की सावधानी बरतता है कि उसका चमचा कभी भी अपनी शक्ल का उपयोग न करे.


चमचा बड़ी तरकीब से ये बात फैलाता है कि नेता का विश्वासपात्र है, उनका आत्मीय है और वे उसकी बात कभी नहीं टालते. वह उनके साथ जगह-जगह दिखता है. उनका बस्ता रखे रहता है. ठीक पीछे मुस्कुराता खड़ा रहता है. नेता के गले में माला पड़ती है, तो चमचा गद्गद् होता है. नेता आगे बढ़ता है, तो चमचा रास्ता बनाता जाता है. वह सफर में उनके साथ होता है, मंच पर पीछे बैठा मुग्ध होता रहता है, ड्राइंग-रूम में बैठा दिखता है और रसोईघर में भी घुस जाता है. लोग उसे देखते हैं और लाभ उठाने वाले समझ जाते हैं कि इसी की मारफत काम हो सकता है. चमचे की कीमत समाज में बढ़ जाती है. उसे लोग चाय पिलाते हैं, पान खिलाते हैं और वह ‘भैया सा’ब’ के गुण-गान करता है. यह कहना नहीं भूलता कि भैया सा’ब मुझसे पूछे बिना कुछ नहीं करते.

 

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