बिहार में पुलिस कस्टडी से क्यों भाग रहे ब’दमाश, जानें….

अ’पराधियों पर बुलडोजर चलाकर एक नया मॉडल तैयार करने वाली योगी सरकार जब उत्तर प्रदेश में स’त्ता की वापसी कर रही थी, ठीक उसी दौरान बिहार पुलिस संसाधन की दुश्वारियों से जूझ रही थी। राजधानी के SK पुरी थाना की पुलिस के पास हथकड़ी नहीं थी, जिसे लगाकर वह आ’रोपियों को थाना से बाहर ले जाए। किसी तरह पुलिस ने जुगाड़ से एक आरोपी के हाथ में हथकड़ी लगाई और दूसरे के कमर में जानवर की तरह रस्सी बांध दिया गया। संसाधनों से जूझ रही बिहार पुलिस की यह तस्वीर उस दौर की है, जब राज्य में हर साल कस्टडी से फरार अ’पराधियों के कारण किरकिरी हो रही है।

बिहार में पुलिस की कस्टडी से आ’रोपियों के भागने की घ’टना आम बात है। ऐसी घटना से बिहार पुलिस की किरकिरी होती है। एक साल में 80 घंटनाएं चर्चा में आईं। वर्ष 2022 में कई बड़ी घटनाएं हुईं। हाजीपुर में 25 फरवरी को वैशाली थाना क्षेत्र के मदारना गांव में हुई ह’त्या का आ’रोपी पुलिस कस्टडी से फरार हो गया।

जनवरी माह में पटना मेडिकल कॉलेज से मुजफ्फरपुर का एक अभियुक्त पुलिस कस्टडी से फ’रार हो गया। ऐसी घटनाएं राज्य के अन्य थाना क्षेत्रों से भी चर्चा में आईं। पुलिस क’स्टडी से हो रही आtरोपियों के भागने की घटना के पीछे पुलिस कर्मियों का कहना है कि थानों में या तो ह’थकड़ी नहीं है जिससे आ’रोपियों को रस्सी में बांधना पड़ता है या फिर वह काफी पुरानी हो गई है।

थानों में ह’थकड़ी तथा अन्य संसाधनों के लिए पुलिस लाइन से डिमांड भेजी जाती है। इसमें ह’थकड़ी से लेकर लाठी, डंडा व अन्य रस्सा होता है। थानों की हा’लत देखकर ऐसा लगता है कि काफी दिनों से डिमांड ही नहीं जा रही है। ऐसे में पुलिस को पुरानी जंग लगी हथकड़ी और रस्सा से काम चलाना पड़ रहा है। कार्रवाई के डर से नाम न प्रकाशित करने के आग्रह के साथ कुछ थानों के थानेदारों ने कहा कि हथकड़ी मिल ही नहीं पाती है। कुछ हथकड़ी है तो वह काफी घिस चुकी है जिससे आ’रोपियों के भागने का डर बना रहता है। ऐसे में जब अधिक आ’रोपी आ जाते हैं तो मजबूरन रस्सा बांधकर ही आ’पियों को मेडिकल के लिए या फिर जेल भेजा जाता है।

बिहार में पुलिस कस्टडी में आने के आद आरोपियों की हालत जानवरों से भी बदतर हो जाती है। मानवाधिकार का उल्लंघन भी थानों में पुलिस की संसाधनों की कमी से खूब होता है। थाना में आरोपियों को पकड़े जाने के बाद जानवर की तरह बांधने का कोई नियम नहीं है, लेकिन पुलिस इसका ख्याल नहीं रखती है। ऐसे में मानवाधिकार का उल्लंघन होता है। थाना पुलिस आ’रोपियों की गि’रफ्तारी के बाद जेल ले जाने से पहले कोरोना जांच के लिए अस्पताल ले जाती है। इसके बाद वहां से जेल भेजा जाता है।

इस यात्रा के दौरान ही आ’रोपियों के भागने की घ’टनाएं हुई हैं, क्योंकि ह’थकड़ी नहीं होने से पुलिस आ’रोपियों के कमर में रस्सी बांधती है जो वह आसानी से सरका कर भाग जाते हैं। इससे पुलिस का दोहरा नुकसान है, एक तरफ मानवाधिकार का उल्लंघन हो रहा है दूसरी तरफ पकड़ भी ढीली हो रही है।

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