बिहार : नालंदा जिला मुख्यालय बिहारशरीफ से लगभग 20 किलोमीटर दूरी पर स्थित सिलाव। यहां के खाजे की मिठास से पूरी दुनिया वाकिफ है। ऐसे में राजगीर-नालंदा का भ्रमण करने वाले पर्यटक खाजे का जायका लेना कभी नहीं भूलते। 52 परत वाले खाजे की शुरुआत यहां के ही बाशिंदे काली साह ने करीब 200 साल पहले की थी।

पहले इसे खजूरी कहा जाता था, लेकिन धीरे-धीरे इसका नाम खाजा पड़ा। 200 साल बीत गए, लेकिन खाजा के स्वाद में कोई फर्क नहीं आया है। आम आदमी से लेकर खास तक को यह व्यंजन बहुत लुभाता है। आज इनकी चौथी पीढ़ी इस व्यवसाय से जुड़ी है। काली साह के नाम से सिलाव में छह दुकानें है। उनकी पीढ़ी के कुल 31 लोग जीवित हैं।

खास बात कि काली शाह के खानदान में कोई भी बाहर नहीं गया, लेकिन सिलाव के खाजा को जरूर बाहर तक पहुंचाया। परपोते संदीप की बहाली दरोगा में हुई, लेकिन उन्होंने अपने परदादा के व्यवसाय को ही चुना। करीब 30 लोगों का परिवार इस व्यवसाय से जुड़ा है।
काली साह के परपोते संदीप लाल ने बताया कि करीब दो सौ साल पहले उनके परदादा काली शाह ने उनकी शुरुआत की थी। उनके तीन पुत्र थे किशुन साह, शरण साह व पन्नालाल। उस वक्त भी खाजा शुद्ध घी में बनाया जाता था। इनकी पुरानी दुकान सिलाव के खारी कुआं मोहल्ले में था। वर्तमान में वायपास रोड उस वक्त नही था।
पहले बाजार वाली रोड ही मेन रोड था। उसी रोड से सभी गाडिय़ां चलती थी। बाईपास रोड से छोटी रेल गाड़ी का लाइन बिछी थी, जिसपर रेलगाडिय़ां चलती थीं। संदीप लाल ने बताया कि दिवंगत काली साह का मिठाई बनाने का पुश्तैनी धंधा था। दो सौ साल पहले जो खाजा बनता था उसे खजूरी कहा जाता था। उस वक्त घर मे हीं गेंहू पीस कर मैदा तैयार किया जाता था। शुद्ध घी में खाजा बनता था। उस समय एक पैसे सेर खाजा बेचा जाता था।
