मोतिहारी। प्रत्येक वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को कामदा एकादशी कहा जाता है। इस वर्ष यह एकादशी 12 अप्रैल मंगलवार को पड़ रही है। सभी सांसारिक कामनाओं की पूर्ति के लिए कामदा एकादशी का व्रत किया जाता है। कामदा एकादशी को फलदा एकादशी भी कहा जाता है। उक्त बातें आयुष्मान ज्योतिष परामर्श सेवा केन्द्र के संस्थापक साहित्याचार्य ज्योतिर्विद आचार्य चन्दन तिवारी ने कहीं। उन्होंने बताया कि कामदा एकादशी वर्ष भर में आने वाली सभी एकादशियों में सबसे खास है। वस्तुत: नव संवत्सर में आने के कारण इसे खास महत्व दिया गया है।
ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति कामदा एकादशी का उपवास करता है उसे प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है। साथ ही कामदा एकादशी को भलीभांति करने से वाजपेयी यज्ञ के समान फल मिलता है। एक बार राजा युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कामदा एकादशी के बारे में जानने की इच्छा व्यक्त की। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें विधिवत कथा सुनायी।
कहा कि प्राचीन काल में एक रत्नपुर नगर था। वहां के राजा पुण्डरीक बहुत प्रतापी और दयालु थे। उनके राज्य में कई अप्सराएं और गंधर्व निवास करते थे। इन्हीं गंधर्वों में एक जोड़ा ललित और ललिता का भी था। ललित तथा ललिता में अपार स्नेह था। एक बार राजा पुण्डरीक की सभा में अप्सराएं नृत्य कर रही थीं और गंधर्व गीत गा रहे थे।
उन्हीं गंधर्वों में ललित भी अपनी कला का प्रदर्शन कर रहा था। गाना गाते समय वह अपनी पत्नी को याद करने लगा जिससे उसका एक पद खराब हो गया। कर्कोट नाम का नाग भी उस समय सभा में ही बैठा था। उसने ललित की इस गलती को पकड़ लिया और राजा पुण्डरीक को बता दिया। कर्कोट की शिकायत पर राजा ललित पर बहुत क्रुद्ध हुए और उन्होंने उसे राक्षस बनने का श्राप दे दिया।
राक्षस बनकर ललित जंगल में घूमने लगा। इस पर ललिता बहुत दुखी हुई और वह ललित के पीछ जंगलों में विचरण करने लगी। जंगल में भटकते हुए ललिता श्रृंगी ऋषि के आश्रम में पहुंची। वहां श्रंगी ऋषि ने उसे कामदा एकादशी का व्रत करने को कहा। कामदा एकादशी के व्रत से ललिता का पति ललित वापस गंधर्व रूप में आ गया। इस तरह दोनों पति-पत्नी स्वर्ग लोक जाकर वहां खुशी-खुशी रहने लगे।
