यही वजह है कि न तो खुले चैंबर ढंके जा रहे हैं और न ही गड्ढे। हम तो बस सिस्टम को बार-बार याद दिला रहे हैं कि ऐसे गड्ढे जानलेवा हैं। उम्मीद करते हैं कि नगर निगम और राजधानी की अन्य सरकारी एजेंसियां आम आदमी की व्यथा को महसूस कर ऐसी नजीर पेश करें कि शहर में गड्ढों से कोई हादसा न हो।
एक साल से अपने घर पर हूं। जॉय (खुशी) अब सिर्फ मेरे नाम का ही हिस्सा है, जीवन में जॉय (खुशी) की जगह शरीर में होने वाले दर्द और तंगहाली ने ले ली है। मैं आज भी 11 अक्टूबर 2017 की उस शाम को नहीं भूल पाया हूं, जब कोलार में सड़क पर ड्राइव करते हुए अचानक गड्ढ़ा सामने आ गया था। मेडिकली अनफिट होने के कारण नौकरी चली गई। मेरा दुनिया भर में घूमते रहने का शौक भी छूट गया। काश, वो एक्सीटेंड न होता तो आज मैं ड्यूटी पर होता और प्रमोशन पाकर कैप्टन बन गया होता।
सैलरी एक लाख से बढ़कर सवा लाख रुपए हो गई होती। ऑस्टेलियन सी भी अब तक घूम लिया होता, लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि आधा घंटे भी पैदल नहीं चल पाता हूं। वजन भी नहीं उठा सकता। कभी शरीर दुखता है, कभी चक्कर आने लगते हैं। पिछले एक साल से घर से पत्नी के होटल और अस्पताल के अलावा कहीं नहीं गया।
बहुत गुस्सा आता है, ऐसे गैरजवाबदेह और गैरजिम्मेदाराना सिस्टम पर, जहां एक कंपनी का ठेकेदार सड़क पर मनमर्जी से गड्ढा खोदता है और खुला छोड़कर चला जाता है। मेरा गुस्सा तब और बढ़ जाता है कि जब मेरे साथ हुए हादसे के बाद भी सरकारी एजेंसियों ने कोई सबक नहीं लिया।
बिना परमिशन के कभी पाइपलाइन के लिए तो कभी केबल के नाम पर गड्ढे खोदने का क्रम बदस्तूर जारी है। इन गड्ढों के पास न तो कोई सुरक्षा इंतजाम हैं और न ही संकेतक। मेरे साथ हुए हादसे में एयरटेल कंपनी के जिस ठेकेदार को पुलिस ने गिरफ्तार किया था, वो जमानत पर रिहा होने के बाद से गायब है। कोर्ट में हमारा कंपनसेशन का केस लंबित है, परिवार के गुजारे के लिए पत्नी रेस्तरां चलाती है।