विधान परिषद के होने वाले नए सभापति को जानिए:देवेशचंद्र ठाकुर ‘केकड़ा भोज’ देने वाले नेता

बिहार विधान परिषद में नए सभापति देवेश चंद्र ठाकुर होंगे। वे कार्यकारी सभापति अवधेश नारायण सिंह की जगह लेंगे। मंगलवार को अपने आवास पर वे बैठे थे और लोगों के फोन लगातार आ रहे थे। हमने उनसे उनके बारे में लंबी चर्चा की। अपने जिस कमरे में बैठ कर वे लोगों से मिल रहे थे वहां गांधी की ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर और किनारे की तरफ मदर टेरेसा की तस्वीर लगी दिखी।

Devesh Chandra Thakur, तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से देवेश चंद्र ठाकुर...

एक किनारे देवेश चंद्र ठाकुर के पीए की फोटो भी दीवार पर जिनका निधन कैंसर से हो गया। बाकी कई तरह की तस्वीरें दीवार पर। नीतीश कुमार के साथ वाली तस्वीर से लेकर महाराष्ट्र के नेताओं के साथ की तस्वीरें और फूलों की तस्वीरें। सदन का लंबा अनुभव इनके पास है और पक्ष- विपक्ष दोनों तरफ के नेताओं से मधुर संबंध रखने वालों में से हैं।

केकड़ा खाने-खिलाने का शौक, खाना खुद से भी बनाते हैं

कार्यक्रमों में देवेश चंद्र ठाकुर जिस मंच पर रहते हैं वहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनके परिचय में कहते दिखते हैं’ गंगा की गहराई से नेपाल की तराई तक वाले नेता हैं देवेश चंद्र ठाकुर’। प्लांटेशन का शौक ऐसा कि पटना स्थित सरकारी आवास में तो खूब हरियाली दिखती ही है सीतामढ़ी वाला आवास भी फूलों से गुलजार है। इनका दूसरा बड़ा शौक नॉनवेज खाना और लोगों को खिलाना है। ये खुद बेहतरीन नॉनवेज बनाते हैं।

हर सत्र के दौरान स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से चुने जाने वाले एमएलसी चाहे वे किसी भी दल के हों, ‘ केकड़ा भोज ‘ पर जरूर बुलाते हैं। इसके लिए मुंबई के समुंद्र से बड़े-बड़े केकड़े मंगवाते हैं और खुद से बनाकर खिलाते हैं। अभी मुंबई में इनकी कंस्ट्रक्शन कंपनी है। इस सिलसिले में अक्सर मुंबई आना-जाना करते हैं। 69 वर्ष के देवेश चंद्र ठाकुर की सेहत का राज हर दिन एक घंटे मॉर्निंग वाक करना है। क्रिकेट, फुटबॉल, बैडमिंटन में खूब रुचि रही पर अब नहीं खेलते।

चार वर्ष की उम्र में पिता ने पढ़ने के लिए हॉस्टल भेज दिया

ये तिरहुत स्नातक क्षेत्र से विधान पार्षद बनते रहे हैं। यह इनकी लोकप्रियता का पैमाना ही है कि चार जिलों, 28 विधान सभा और पांच लोकसभा वाले तिरहुत स्नातक क्षेत्र से निर्दलीय भी जीतने का दम रखते हैं और पार्टी के साथ भी। इनका जन्म सीतामढ़ी में हुआ। चार वर्ष की उम्र में ही पिता अवध ठाकुर ने उन्हें हजारीबाग संत जेवियर्स के हॉस्टल में डाल दिया पढ़ने के लिए। पिता सीतामढ़ी कोर्ट में जाने-माने वकील रहे। पिता चाहते थे कि बेटा भी वकील बने। तीन भाईयों में देवेश सबसे छोटे हैं। बड़े भाई उमेश चंद्र ठाकुर कर्नल हुए, दूसरे भाई डॉ. रमेश कुमार यूनाइटेड नेशन की यूनिवर्सिटी टोक्यो में वाइस चांसलर से रिटायर हुए। बहन डॉ. प्रेमा झा भागलपुर यूनिवर्सिटी में वर्ष 2006 से 2009 के बीच कुलपति रह चुकी हैं। दूसरी बहन वीणा झा हैं। देवेश चंद्र की शादी नेपाल बॉर्डर के पास भिट्ठा मोड़ की रहनेवाली रीता झा हुई। शायद यही वजह है कि सदन में भी कई बार देवेश नेपाली टोपी में दिखते रहे हैं।

विलासराव देशमुख, सुशील सिंदे आदि से काफी निकट रहे

देवेश चंद्र ठाकुर ने बीए ऑनर्स की पढ़ाई फार्गुसन कॉलेज पुणे से की। इसके बाद एलएलबी की पढा़ई आईएलएस पुणे से। वहां ये फर्स्ट डिविजनर रहे। देवेश, हिंदी और अंग्रेजी पर समान अधिकार रखते हैं। इसके अलावा मराठी, बंगाली, मैथिली भी आराम से बोलते हैं। जब ये पुणे में पढ़ रहे थे तभी स्टूडेंट यूनियन का चुनाव लड़ने लगे। महाराष्ट्र प्रदेश यूथ कांग्रेस के वाइस प्रेसीडेंट चुने गए। वहां विलासराव देशमुख, सुशील कुमार सिंदे से काफी निकट रहे।

25 देशों की यात्रा कर चुके हैं, बिहार सरकार में मंत्री रह चुके हैं

देवेश चंद्र ठाकुर ने1990 में कांग्रेस से विधान सभा का टिकट रुन्नीसैदपुर के लिए मांगा लेकिन उन्हें टिकट दे दिया गया बथनाहा से।1994 से 95 तक वे कांग्रेस में रहे। इसके बाद पानी वाले जहाज में नौकरी लग गई तो नौकरी करने चले गए। कंपनी में बतौर डायरेक्टर 25 देशों की सैर की। स्वीटजरलैंड इनकी पसंदीदा जगह है। देवेश वर्ष 2002 में स्नातक क्षेत्र तिरहुत से एमएलसी हो गए। 2008 में जदयू ज्वाइन कर लिया। 2008 में जदयू के टिकट पर स्नातक क्षेत्र से उम्मीदवार बने और एमएलसी हुए। उस समय नीतीश कुमार की सरकार में आपदा प्रबंधन मंत्री भी बने। जदयू ने नेशनल टीवी चैनलों में अंग्रेजी में बेहतर बोलने वाले प्रवक्ता के रुप में इनकी पहचान की और वे पार्टी का पक्ष रखने वाले महत्वपूर्ण चेहरा बन गए। 2014 में एमएलसी का चुनाव निर्दलीय लड़ते हुए जीते। इसके बाद 2020 में जदयू की तरफ से एमएलसी बने।

बिहार दिवस मनाया जाए, इसकी पहल की

बिहार दिवस की रुपरेखा बनाने में इनकी भूमिका रही। सबसे पहले वर्ष 2000 में राजद की सरकार को पत्र लिखा कि महाराष्ट्र, राजस्थान की तरह बिहार में बिहार दिवस क्यों नहीं मनाया जाता? 2006 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इन्होंने इसके लिए आग्रह किया। आखिरकार 2010 में राजगीर में हुई कैबिनेट बैठक में बिहार दिवस मनाए जाने पर मुहर लगी।

देवेश चंद्र ठाकुर अपने इन कार्यों के लिए भी जाने जाते हैं-

  • अपने क्षेत्र तिरहुत में कई शहीदों की प्रतिमाएं अपने खर्च पर लगवाई।
  • दानापुर में युद्ध स्मारक का 2006 में पुनर्निर्माण अपने खर्च से करवाया।
  • हर वर्ष दिव्यांगों के बीच ट्राईसाइकिल बांटते हैं। अब तक 500 को दे चुके हैं।
  • पटना के एस.के.एम. में ‘एक शाम शहीदों के नाम’ चर्चित कार्यक्रम देवेश चंद्र ठाकुर ही करवाते हैं। (इसमें बिहार के ऐसे जवान जो पारामिलिट्री, बीएसएफ आदि में रहते हुए शहीद हुए हों उनके परिवार को 50 हजार से एक लाख रुपए तक का चेक देते हैं।)
  • 2012 में मुंबई में बिहार शताब्दी समारोह मनाया गया। उस समय राज ठाकरे ने कहा था कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को महाराष्ट्र में घुसने नहीं देंगे लेकिन इन्होंने भव्य कार्यक्रम किया और नीतीश कुमार उसमें शामिल हुए। डेढ़ लाख बिहारी उसमें जुटे थे।
  • पटना एयरपोर्ट के पास वाली सड़क जिसका नाम टेलर रोड था उसका नाम बदलवाकर शहीद पीर अली मार्ग करवाया। टेलर ने ही स्वतंत्रता सेनानी पीर अली को फांसी पर चढ़वाया था।
  • हजार जरूरतमंद बच्चों का एडमिशन मुंबई के संस्थानों में बिना डोनेशन के करवा चुके हैं।

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