चौंकाते मुखौटे, रिझाता स्वांग, वीरता की गाथा… आपने देखी 500 साल पुरानी अनोखी परंपरा?

उत्तराखंड में लोकपर्व आज भी आस्था, विश्वास, रहस्य और रोमांच के प्रतीक हैं. आज आपको दिखाते हैं सोरघाटी का ऐतिहासिक हिलजात्रा पर्व, जो यहां पिछले 500 सालों से बदस्तूर मनाया जा रहा है. हालांकि इसका स्वरूप बदला है. सातू.आंठू से शुरू होने वाले कृषि पर्व का समापन में पिथौरागढ़ में हिलजात्रा के रूप में होता है. इस अनौखे पर्व में बैल, हिरण, लखिया भूत जैसे दर्जनों पात्र मुखौटों के साथ मैदान में उतरकर देखने वालों को रोमांचित कर देते हैं. घाटी के कई इलाकों में इस पर्व को मनाए जाने के लिए हज़ारों की संख्या में लोग आते हैं.

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हिलजात्रा पर्व सोर, अस्कोट और सीरा परगना में मनाया जाता है लेकिन सबसे अधिक ख्याति कुमौड़ की हिलजात्रा की है. इस साल 24 अगस्त को संपन्न हुए इस पर्व को देखने भार भीड़ उमड़ी. कुमौड़ की हिलजात्रा के बारे में कहा जाता है कि यहां के चार महर भाइयों की वीरता से खुश होकर नेपाल नरेश ने मुखौटों के साथ हिलजात्रा पर्व भेंट किया था. तभी से यहां यह पर्व हर साल मनाया जा रहा है.

आयोजन समिति के सचिव यशवंत महर ने बताया कि वीरता के प्रतीक इस पर्व को मनाने के कुमौड़ का पूरा गांव जुटा रहता है. समय के साथ इसकी लोकप्रियता इस कदर बढ़ गई है कि भीड़ को कंट्रोल करने के लिए पुलिस की मदद भी लेनी पड़ती है. इस पर्व का आगाज भले ही महरों के बहादूरी से माना जाता हो, लेकिन अब इसे कृषि पर्व के रूप में मनाने की परम्परा है.

Ravi photos - Kumor Hill Jatra - 2019 pithoragarh | Facebook

हिलजात्रा में बैल, हिरण, चीतल और धान रोपती महिलाएं यहां के कृषि जीवन के साथ ही पशु प्रेम को भी दर्शाती हैं. हिलजात्रा में अभिनय करने वाले कई पात्र तो खुद के अभिनय को ईश्वरीय चमत्कार मानते हैं. लखिया भूत के पात्र निखिल महर बताते हैं कि वे पिछले दो सालों से पात्र कर रहे हैं लेकिन इसके प्रदर्शन के दौरान वे अद्भुत ऊर्जा महसूस करते हैं. एक दर्शक निर्मल बसेड़ा का कहना है कि इस पर्व को देखने के लिए वह हर साल पहुंचते हैं. ड्यूटी जिले के बाहर होने के बाद भी कोशिश करते हैं.

घंटों तक चलने वाले हिलजात्रा पर्व का समापन उस लखिया भूत के आगमन के साथ होता है, जिसे भगवान शिव का गण माना जाता है. लखिया भूत अपनी डरावनी आकृति के बावजूद हिलजात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण है. जो लोगों को सुख, समृद्दि और खुशहाली का आशीर्वाद देकर अगले साल आने का वादा कर चला जाता है. अब इस लोकपर्व में इस्तेमाल होने वाले मुखौटों के इतिहास को भी जानें.

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इन मुखौटों के पीछे करीब 5 सौ साल पुराना इतिहास है, जिसकी इबारत चार महर भाइयों ने 16 वीं शताब्दी में लिखी थी. कहते हैं नेपाल नरेश ने ही मुखौटे इनाम में दिए थे. नेपाल से भारत आए ये मुखौटे सोरघाटी की सुख समृद्धि के प्रतीक भी माने जाते हैं. इन मुखौटों में लखिया भूत, बड़े और छोटे नेपाली बैल और हिरन आदि के मुखौटे शामिल हैं. हिलजात्रा के दिन इन मुखौटों की मदद से ही कलाकार लोगों को पहाड़ के कृषि प्रेम से रूबरू कराते हैं.

इस पर्व में पात्रों का रोमांचित करने वाला अभिनय दर्शकों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर देता है. आस्था, विश्वास और रोमांच की प्रतीक हिलजात्रा अब पिथौरागढ़ की पहचान बन गई है. मुखौटा कलाकार कैलाश सिंह बताते हैं कि हर साल पर्व से पहले सभी मुखौटों में कलर किया जाता है. वर्तमान में करीब 20 अलग-अलग मुखौटों का उपयोग होता है. असल में हिलजात्रा यह तस्दीक भी करती है कि पहाड़ आधुनिकता और परम्पराओं का सामंजस्य बनाकर आगे बढ़ रहा है.

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