नई व्यवस्था:नवसृजित विद्यालयों में बच्चों को जल्द मिलेगा एमडीएम, होटल जैसा मेन्यू, घर से भी कम बजट

औरंगाबाद। नव सृजित विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों के लिए एक अच्छी खबर है। जिन स्कूलों में अभी तक मध्याह्न भोजन योजना का लाभ छात्र-छात्राओं को नहीं मिलता है। वहां जल्द ही इस योजना को शुरू किया जाएगा। करीब 218 नव सृजित विद्यालय जिलेभर में हैं। जिनमें मध्याह्न भोजन बच्चों को नहीं मिल पा रहा है।

डीएम सौरभ जोरवाल ने स्कूलों के निरीक्षण के बाद कुटुम्बा में डीईओ को आदेश दिया था। जिसके बाद मध्याह्न भोजन डीपीओ द्वारा एक पत्र जारी कर दिया गया। सभी प्रखंडों के बीईओ, एमडीएम बीआरपी द्वारा ऐसे स्कूलों को चिन्हित कर जल्द से जल्द योजना शुरू करने की कवायद शुरू कर दी गई है।

स्कूलों में संचालित पीएम पोषण योजना यानी मध्याह्न भोजन का मेन्यू होटलों जैसा है। खाना भी ऐसा मानो बच्चा को मिल जाए तो बीमारी उससे दूरे भाग जाए। बच्चा शारीरिक से लेकर मानसिक तौर पर स्वस्थ्य हो। क्योंकि पढ़ाई के लिए स्वस्थ्य होना जरूरी है। विभाग का ये सोच अच्छा है। योजना भी बेहतर है, लेकिन योजना का बजट कई सवाल खड़ा करता है।

मध्याह्न भोजन संचालन के लिए प्राथमिक स्कूलों में पहला से पांचवीं तक के छात्रों के लिए चावल के अलावे प्रति बच्चा 4.97 रुपया दिया जाता है। जबकि छठी से आठवीं क्लास तक के लिए प्रति बच्चा 7.45 रुपया दिया जाता है। शुक्रवार को अंडा या फल के लिए प्रति बच्चा पांच रुपया अलग से दिया जाता है। अब इतना कम पैसा तो घरों में बजट के भी नहीं होते।

इस महंगाई में पांच रुपए में कोई फल नहीं मिलता और नहीं कोई अंडा। सरसो तेल, दाल और मसाला की कीमत भी आसमान छू रहा है। फिर बच्चों को पोषणयुक्त खाना कैसे दिया जाता है। लिहाजा बच्चों की उपस्थिति फर्जी दिखाकर हेडमास्टर योजना का संचालन करते हैं।

जिलेभर के करीब 2300 स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना का संचालन किया जाता है। विभागीय आंकड़ा के अनुसार करीब पांच लाख बच्चे एमडीएम योजना से जुड़े हुए हैं। प्राथमिक व मीडिल स्कूलों में इस योजना का संचालन होता है।

इस योजना के तहत बच्चों को प्रत्येक दिन अलग-अलग मेनू के हिसाब से पोषणयुक्त खाना स्कूल में परोसा जाता है। इससे बच्चों का सेहत पर अच्छा प्रभाव पड़ता है और छात्र संख्या में भी बढ़ाेतरी होती है।

हालांकि कुछ स्कूलों को छोड़ दें तो इस योजना से बच्चों को कम हेडमास्टर और बीआरपी को ज्यादा फायदा है। क्योंकि योजना के बहाने हेडमास्टर पढ़ाने से बच जाते हैं और बीआरपी जांच के नाम पर हेडमास्टरों का आर्थिक शोषण करते हैं। क्योंकि जिले के कई बीआरपी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप पहले लग चुका है। दो की नौकरी भी जा चुकी है। जिससे यह साबित हो चुका है।

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