मधुबनी। उत्तर बिहार के मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर और सहरसा के का’रा में बं’दियों को रो’जगारपरक प्रशिक्षण देकर स्वावलंबी बनाया जा रहा है। उन्हें जैविक खाद बनाने और सब्जियों की खेती से लेकर मिथिला की लोककला तक का प्र’शिक्षण दिया जा रहा है। पुरुष बंदियों को जहां खाद और सब्जी की खेती के गुर सिखाए जाते, वहीं महिलाओं को मिथिला पेंटिंग और सिक्की कला की बारीकियां बताई जाती हैं।
इसके लिए मिथिला कला विकास समिति बीते दो वर्षों से काम कर रही है। उसके प्रयास से ही मधुबनी मंडल कारा और झंझारपुर उपकारा में बंदियों ने प्रशिक्षण पाकर जैविक खाद बनाने के साथ सब्जियों की खेती शुरू की है। इसमें कारा में तैयार जैविक खाद का ही इस्तेमाल किया जाता है। दो दर्जन से अधिक बंदियों ने सजा पूरी करने के बाद जैविक खाद का काम शुरू किया है। उन्होंने कारा की तमाम बंदिशों से निकलकर जीवन की निराशा को दूर करते हुए सकारात्मक जीवन की शुरुआत की है।
बीते दो वर्षों में चार हजार पुरुष बं’दियों को जैविक खाद और 400 महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई, मधुबनी पेंटिंग और सिक्की कला का प्रशिक्षण दिया गया है। इन्हें तीन माह पर दो-तीन दिनों का प्रशिक्षण दिया जाता है। इस दौरान उत्पादन, उपयोग के लाभ और कारोबार की जानकारी दी जाती है। प्रशिक्षित बंदियों को प्रमाणपत्र दिया जाता है। इस आधार पर उन्हें बैंक से ऋण लेने में भी सहूलियत होती है।
मिथिला कला विकास समिति के सचिव मनोज कुमार झा ने बताया कि समिति के ‘एक कदम स्वावलंबन की ओर’ प्रोग्राम के तहत बंदियों को जैविक खाद का उत्पादन, उपयोग और इसके रोजगार के महत्व से अ’वगत कराया जाता है। इसका उद्देश्य बंदियों को कारा से बाहर निकलने पर उन्हें सहज ढंग से स्वावलंबी बनाना है।
कारा से निकलने के बाद वे समाज की मुख्यधारा में शामिल होकर कुटीर व लघु उद्योग के लिए सरकार की योजना का लाभ उठा सकें। समिति के प्रोग्राम को-आर्डिनेटर राहुल कुमार कारा में प्रशिक्षण का लगातार निरीक्षण करते हैं। प्रशिक्षण पर अब तक करीब 90 हजार रुपये का खर्च आया है, जिसका वहन समिति से जुड़े कारोबारियों के सहयोग से किया गया है।
मंडल कारा अधीक्षक जलज कुमार ने बताया कि, मिथिला कला विकास समिति द्वारा मंडल कारा में रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण का बंदियों में सकारात्मक प्रभाव देखा जा रहा है। कारा में जैविक खाद का उत्पादन शुरू हुआ है। इसका उपयोग पेड़-पौधों में किया जा रहा है।


