बीआरए बिहार विश्वविद्यालय का प्रेस कबाड़ हो गया है। परिसर से लेकर प्रेस के भवन में जलजमाव है और मशीनें उसमें सड़ रही हैं। कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक किसी का ध्यान इस ओर नहीं है। देखरेख नहीं होने के कारण विश्वविद्यालय के प्रेस की स्थिति बदहाल हो गई है। वहीं दूसरी ओर विश्वविद्यालय डिग्री, अंकपत्र, प्रश्नपत्र, उत्तरपुस्तिका, टेबलेटिंग रजिस्टर, लिफाफा, बार कोड से लेकर अन्य सामग्री की छपाई के नाम पर दूसरे प्रदेश की कंपनी को करोड़ों रुपये भुगतान प्रति वर्ष कर रही है।
विश्वविद्यालय के प्रेस को शुरू करने को लेकर छात्र संगठनों ने कई बार आवाज बुलंद किया, लेकिन अधिकारियों ने इसे नजरअंदाज कर दिया। विश्वविद्यालय प्रेस से जुड़े लोग बताते हैं कि कंपनी जो डिग्री छापकर 39 रुपये में विश्वविद्यालय को दे रही है उसे यहां का प्रेस शुरू हो जाने पर आधी कीमत में प्रिंट कर तैयार किया जा सकता है। ऐसे में विश्वविद्यालय प्रेस के माध्यम से करोड़ों रुपये प्रति वर्ष बचा सकता है।
बता दें कि डिग्री के लिए 39, ओएमआर शीट पर 10 रुपये, ए थ्री आकार से अधिक के पेपर पर 25 रुपये प्रति पेपर की दर से कंपनी को भुगतान किया जा रहा है।
स्नातक में एक लाख से अधिक, पीजी में करीब छह हजार, बीएड, ला, वोकेशनल, होम्योपैथ, यूनानी, आयुर्वेद समेत अन्य कोर्स से करीब दो लाख विद्यार्थी प्रतिवर्ष यहां से नामांकन लेकर पास हो रहे हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय करोड़ों रुपये कंपनी को दे रही है, लेकिन अपने प्रेस को शुरू करने के लिए फंड नहीं है।
विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने प्रेस को शुरू करने को लेकर प्रस्ताव तैयार किया। इसमें बताया गया कि अत्याधुनिक तकनीक से लैस प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना में डेढ़ करोड़ रुपये खर्च आएंगे। इसके लिए कई कंपनियों से बात कर प्रस्ताव तैयार किया गया।
इसे कुलपति के पास भेजा गया, लेकिन फाइल यहीं दबी हुई है। बताया जा रहा है कि पुराने जर्जर हुए प्रेस की नीलामी कर इससे 30 लाख से अधिक राशि प्राप्त हो सकती है। वहीं नए प्रेस को लेकर बना प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.हनुमान प्रसाद पांडेय से प्रेस की स्थापना को लेकर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि पुराना प्रेस शुरू होने की स्थिति में नहीं है। उसमें बहुत टेक्निकल माडिफिकेशन की जरूरत होगी। इसको लेकर पहले फंड की व्यवस्था करनी होगी इसके बाद नए प्रेस की स्थापना पर विचार किया जाएगा।

