पितृपक्ष 2022: यहां करें पिंडदान, नर्क भोग रहे पूर्वजों को भी स्वर्ग की होगी प्राप्ति

गया. मोक्ष नगरी गया जी में पिंडदान के ग्यारहवें दिन गया सिर वेदी और गया कूप नामक दो तीर्थों में पिंडदान होता है. गया सिर की ऐसी मान्यता है कि यहां पिंडदान करने से नर्क भोग रहे पूर्वजों को भी स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है. वहीं, गया कूप के बारे में कहा जाता है कि यहां पिंडदान करने से जो स्वर्गस्थ पितर हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है. दोनों तीर्थों की पौराणिक कथा भी प्रचलित है.

पितृ पक्ष का 11 वां दिन, पिंडदान करते श्रद्धालु.

गया कूप वेदी में त्रिपिंडी श्राद्ध करने से प्रेतों का मोक्ष होता हैं. गया निमित्तक श्राद्ध करने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है. इस वेदी में एक कूप है, जिसे गया सुर की नाभि कहा जाता है. यहां पितरों से प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है. नारियल में पितर को आह्वान कर कर्मकांड का विधि विधान कर के नारियल को उस कूप में छोड़ दिया जाता है.

इस वेदी पर पिंडदानी पर प्रेतों का साया आ जाता है. ऐसे में वेदी के पास कूप के निकट दीवारों में लोहे का सिक्का रखा रहता है, उससे बांध दिया जाता है. उसके बाद वहां के पंडित मंत्रों से प्रेत से मुक्ति दिलाते हैं. झूलन बाबा बताते हैं कि जैसे मनुष्य कई प्रकार के होते हैं. उसी तरह प्रेत भी कई प्रकार के होते हैं, जो जल्दी नहीं मानता है. गया सिर वेदी पर प्रतिनिधि पिंडदान किया जाता है. किसी अक्षम और असहाय का पिंडदान प्रतिनिधि बनकर इस वेदी पर पिंडदान कर पूर्वजों को मोक्ष दिला सकते हैं.

पिंडदान मातृ व पितृ कुल के 7 गोत्र का होता है उद्धार

गया सिर वेदी और गया कूप वेदी दोनों गया असुर के सिर भाग पर अवस्थित है. यह स्थान ब्रह्म जी के द्वारा यज्ञ किए जाने से परम पावन हो गया. भगवान विष्णु के वरदान से यह परम पावन हो गया था. विष्णु के माया से वो विष्णु के द्वारा मोहित होकर निहित हुआ. कर्मपुराण के अनुसार यहां का पिंडदान मातृ कुल एवं पितृ कूल के सात गोत्र का उद्धार होता है तथा श्राद्धकर्ता को भी परम गति प्राप्त कराते हैं. गया सिर वेदी की विशेषता है कि संन्यासी विष्णुपद एवं गया सिर में दंड का स्पर्श कराकर पितरों के साथ स्वयं भी मुक्त हो जाते हैैं.

यह कहानी भी है काफी प्रचलित

कहा जाता है कि विशाल पुरी में पूर्व काल में विशाल नामक एक राजा निसंतान थे. उन्होंने एक ब्राह्मण से पूछा कि हे! श्रेष्ठ ब्राह्मण हमारे कुल को पुत्र कैसे प्राप्त होगा. ब्राह्मण ने कहा श्राद्ध से होगा. विशाल राजा ने भी गया सिर में पिंडदान किया और अब पुत्रवान हो गए. पिंडदान करने के पश्चात जब उन्होंने आकाश की ओर देखा, तो राजा को श्वेत, कृष्ण और रक्त के यह तीन पुरूष दिखाई दिए.

विशाल ने पूछा आप लोग कौन हैं. उनमें से एक श्वेत वर्ण ने कहा मैं श्वेत वर्ण का तुम्हारा पिता हूं. इंद्रलोक से यहां आया हूं. लाल वर्ण वाले मेरे पिता हैं यानी तुम्हारे पितामाह, जिन्होंने ब्राह्मण हत्या रूप का पाप किया है और एक कृष्ण वर्ण वाले मेरे पितामाह जिन्होंने ऋषियों को मारा है. यह सब अविचि नामक नर्क में पड़े हुए थे. तुम्हारे पिंडदान करने से इनकी मुक्ति हो गई है. इन्हें ही साथ लेकर जा रहा हूं.

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