गया. भारत में हर पर्व अपना विशेष महत्व रखता है. ऐसे में बात जब रोशनी के पर्व दीपावली की हो, तो घरौंदे, दीए और आकाशदीप को कैसे भूला जा सकता है. दीपावली के अवसर पर घरौंदा बनाने की सदियों पुरानी परंपरा रही है. हालांकि अब यह परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त होने के कगार पर है. एक दौर था जब दीपावली में मिट्टी के बने घरौंदे आंगन की शान हुआ करते थे, लेकिन बदलते दौर के साथ लकड़ी और टीन के भी घरौंदे न सिर्फ बनने लगे बल्कि पूरी तरह से मिट्टी के घरौंदे की जगह भी ले ली है.
ऐसी मान्यता है कि दुर्गा पूजा के बाद से ही अविवाहित लड़कियां अपने-अपने आंगन या छत पर मिट्टी के घरौंदे बनाया करती थीं. इस क्रम में एक से पांच महल तक का घरौंदे बनाया जाता था. उन दिनों घरौंदा को आकर्षक बनाने के लिए एक-दूसरे के बीच होड़ लगी रहती थी. घरौंदा को सजाने के लिए लड़कियां दीपावली के दिन दीपक जलाकर मिठाइयां रखती थीं. साथ ही घरौंदा में भगवान गणेश एवं माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना करती थीं. पहले घरौंदा में छठ पूजा तक दीपक जलाने की परंपरा थी.
ग्रामीण क्षेत्रों में मिट्टी से बने घरौंदे की एक अलग पहचान थी. हालांकि उस वक्त शहरी क्षेत्रों में भी दीपावली के मौके पर घरौंदा बनाया जाता था, लेकिन अब ऐसा देखने को नहीं मिलता है. जबकि ग्रामीण इलाकों में आज भी कहीं-कहीं घरौंदा दिख जाता है. इन घरौंदे में भी पहले वाली बात नहीं दिखती है. आधुनिक युग में लकड़ी एवं टीन के बने घरौंदे लोगों को खूब पसंद आ रहे हैं. बाजार में तरह-तरह की लकड़ी और लोहे का घरौंदे बिक रहे हैं.
गया शहर के रमना रोड में कई दुकानों में तरह-तरह के घरौंदे की बिक्री हो रही है. लोग पसंद के अनुसार घरौंदे की खरीदारी कर रहे हैं. यहां लकड़ी और टीन का घरौंदा बनाने का काम पितृपक्ष के बाद से ही शुरू हो जाता है. घरौंदा दुकानदार संजय शर्मा ने कहा कि एक दिन में एक व्यक्ति तीन से चार लकड़ी का घरौंदा तैयार करता है. जबकि टीन का घरौंदा मशीन से तैयार किया जाता है. एक व्यक्ति टीन का आठ से दस घरौंदा बना देता है.



