कुढ़नी विधानसभा उपचुनाव: महागठबंधन के मनोज कुशवाहा के सामने बीजेपी ने केदार गुप्ता पर क्यों दांव लगाया?

मुजफ्फरपुर. बिहार में कुढ़नी विधानसभा मे उपचुनाव के लिए बीजेपी ने अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर दी है. भाजपा ने केदार गुप्ता को उम्मीदवार बनाया है. केदार गुप्ता ने इसके साथ ही अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया है. बता दें कि उम्मीदवार चयन को लेकर भाजपा में पिछले कई दिनों से मंथन का दौर चल रहा था. जिसके बाद जदयू के उम्मीदवार मनोज कुशवाहा के सामने भाजपा ने मैदान में केदार गुप्ता को उतार दिया.

कुढ़नी विधानसभा उपचुनाव में केदार गुप्ता भाजपा के उम्मीदवार. कुढ़नी विधान सभा चुनाव में बीजेपी के द्वारा केदार गुप्ता को उम्मीदवार बनाए जाने के पीछे की मुख्य वजह उनका जनाधार माना जा रहा है. दरअसल, केदार गुप्ता 2020 के विधान सभा चुनाव में सिर्फ 712 वोट से राजद उम्मीदवार अनिल सहनी के हाथों चुनाव हारे थे. राजद कैंडिडेट को 78549 वोट मिले थे; जबकि दूसरे नंबर पर रहे बीजेपी को 77837 वोट मिले थे. यहां यह भी बता दें कि 2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू का सहयोग मिलने के बाद भी बीजेपी कैंडिडेट की हार हो गई थी.

वहीं, 2015 के विधान सभा चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार केदार गुप्ता की चुनाव में जीत हुई थी. उस समय जेडीयू और राजद-कांग्रेस का महागठबंधन था. तब बीजेपी कैंडिडेट केदार प्रसाद गुप्ता ने जेडीयू उम्मीदवार मनोज कुशवाहा को हराया था. वर्ष 2015 में बीजेपी कैंडिडेट केदार प्रसाद गुप्ता को 73227 वोट मिले थे. वहीं जेडीयू के मनोज कुशवाहा को 61657 वोट मिले थे. इस तरह से 11570 मतों से जेडीयू कैंडिडेट मनोज कुशवाहा की हार हो गई थी. गौरतलब है कि इसके पहले जेडीयू उम्मीद मनोज कुशवाहा 2005 और 2010 का चुनाव जेडीयू के टिकट पर जीत चुके हैं.

बहरहाल, कुढ़नी विधानसभा में होने वाले उपचुनाव के लिए जदयू और भाजपा दोनों दलों के उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल कर दिया है. इंडिया और महागठबंधन के नेताओं का तूफानी दौरा भी शुरू हो चुका है. लेकिन, कुढ़नी विधान सभा वहां के जातीय समीकरण के हिसाब से किसी एक गठबंधन के लिए जीत की राह बहुत आसान नजर नहीं आ रही है.

दरअसल, यहां का सियासी समीकरण सामाजिक गणित में उलझा हुआ है. वोट के जातीय समीकरण के आधार पर कुढ़नी में सभी दलों की निगाहें वहां भूमिहार, कुशवाहा, सहनी और वैश्य वोटरों पर है. राजद के एमवाई समीकरण में मुसलमान वोटरों की अच्छी तादाद है, लेकिन लेकिन अन्य जातियों के मुकाबले यादवों का वोट कम है.

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