सामा चकेवा एक ऐसा पर्व है जो बिहार के मिथिलांचल में काफी धूमधाम से मनाया जाता है. मिथिलांचल की सांस्कृतिक पर्व इसे कहते हैं. यह पर्व छठ के संपन्न होते ही शुरू हो जाता है. इस पर्व को भाई-बहन के प्यार के तौर पर मनाया जाता है. इसलिए मिथिलांचल में इसे मिथिलांचल का रक्षाबंधन भी कहा जाता है. 8 दिन तक यह उत्सव मनाया जाता है और 9वें दिन बहनें अपने भाइयों को धान की नई फसल का चूड़ा और दही खिलाकर सामा चकेवा की मूर्ति को तालाब में विसर्जित करती है. इस दौरान बैंड बाजे के साथ पूरी धूम धाम से विसर्जन किया जाता है.

इसमें सामा चकेवा के अलावा सातभैया, चुगला, बृंदावन नामक कई प्रकार के छोटी छोटी मूर्तियां बनती है. सामा चकेवा पर्व का संबंध पर्यावरण से भी माना जाता है. पारंपरिक लोकगीत से जुड़ा सामा चकेवा मिथिला संस्कृति की वह खासियत है जो सभी समुदायों के बीच व्याप्त जड़ बाधाओं को तोड़ता है. आठ दिनों तक यह उत्सव मनाया जाता है और नौवें दिन सामा चकेवा की मूर्ति को तालाब में विसर्जित करती है.

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी जीवित है यह पर्व
मिथिला की इस परंपरा को आज भी ग्रामीण क्षेत्र की लड़कियां और महिलाएं जीवित रखी हुई है. शाम के वक्त तोलिया बनाकर गांव के चौराहे पर सामा चकेवा के लोकगीत के साथ इस पर्व को रोजाना मानती है. जिसका विसर्जन पूर्णिमा के दिन किया जाएगा ऐसे ही सामा चकेवा पर्व मानने वाली लड़कियां श्रेया सिंह, जिया कुमारी, देवांगन माही, अक्षरा भारद्वाज और अंशिका मनी बताती है कि यह पर्व भाई-बहन के प्यार का प्रतीक है. धान की नई बालियों से तैयार चूड़ा का इस महापर्व में काफी महत्व है. लोकगीत के साथ हम लोग गांव के चौराहे पर सामा चकेवा की मूर्तियों के साथ खेलते हैं. हंसी ठिठौली होती है. इसमें भाभी को हम लोग गीत संगीत के माध्यम से व्यंग्य करते हैं.