असलम रहमानी ने नुक़ुश-ए-अदब किताब लिखकर युवाओं के लिए एक मिसाल कायम की है। इम्तियाज अहमद करीमी युवा लेखक असलम रहमानी की किताब नुक़ुश-ए-अदब का विमोचन उर्दू प्रेम की भाषा है। इसके विरुद्ध जितनी अधिक विषैली बातें कही जाएंगी और नफरत फैलाई जाएगी, यह भाषा उतनी ही लोकप्रिय होगी।ये बातें बिहार विधान परिषद क सदस्य कारी सोहैब ने युवा लेखक असलम रहमानी की पुस्तक नुकुशे आदाब के विमोचन समरोह मे मुख्य अतिथि के रूप मे भाग लेते हुए कही। वे मुजफ्फरपुर के होटल दी पार्क में अंजुमन नदाए अदब के तत्वावधान में असलम रहमानी की पुस्तक “नक़ूश-ए-अदब” के विमोचन समारोह में बोल रहे थे।

नई पीढ़ी उर्दू से करीब आ रही है, और इसका जीवंत उदाहरण आज का यह विमोचन समारोह है। असलम रहमानी ने अपने छात्र जीवन में इतनी शानदार किताब लिखकर उर्दू समाज को हीन भावना से बाहर आने का संदेश दिया है। इन विचारों को कौमी तनजीम के प्रधान संपादक एस.एम. अशरफ फरीद ने व्यक्त किया।प्रोफेसर फारूक अहमद सिद्दीकी ने कहा कि उनकी शिक्षण सेवा लगभग चालीस वर्षों पर फैली हुई है और इन चालीस वर्षों में पहली बार उन्होंने यह देखा है कि किसी स्नातक छात्र की कलम से इतनी उत्कृष्ट पुस्तक प्रकाशित हुई हो।

उन्होंने पुस्तक के लेखक असलम रहमानी को बधाई दी और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। प्रोफेसर फारूक अहमद सिद्दीकी ने असलम रहमानी के शिक्षक और नीतिश्वर कॉलेज के उर्दू विभागाध्यक्ष कामरान ग़नी सबा को भी बधाई दी। उन्होंने कहा कि कामरान ग़नी सबा के छात्रों की सफलता उनके समर्पण और शिक्षण के प्रति उनकी ईमानदारी को दर्शाती है।

अपने अध्यक्षीय भाषण में बिहार लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष इम्तियाज अहमद करीमी ने विमोचन समारोह में सैकड़ों लोगों की उपस्थिति पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि उर्दू प्रेमियों की इतनी बड़ी संख्या में मौजूदगी यह दर्शाती है कि मुजफ्फरपुर की भूमि उर्दू भाषा को लेकर अत्यधिक जागरूक है। मौलाना मज़हरुल हक अरबी फारसी विश्वविद्यालय के पूर्व प्रो-वाइस चांसलर प्रोफेसर तौकीर आलम ने कहा कि असलम रहमानी की भाषा बहुत ही स्पष्ट और परिष्कृत है। मैं उन्हें उनके लेखों के माध्यम से जानता हूं।प्रसिद्ध पत्रकार डॉक्टर रेहान ग़नी ने कहा कि मुजफ्फरपुर क्रांतिकारी आंदोलनों की भूमि रही है। बिहार में उर्दू को दूसरी राजकीय भाषा का दर्जा दिलाने में बिहार के उर्दू प्रेमियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

उन्होंने कहा कि इस सभा में बड़ी संख्या में महिलाएं और छात्राएं मौजूद हैं। इतिहास गवाह है कि बड़े-बड़े क्रांतिकारी आंदोलनों के पीछे महिलाओं का सशक्त योगदान रहा है। जब आज उर्दू को लेकर निराशाजनक बातें हो रही हैं, तो यदि महिलाएं आगे आएं, तो उर्दू को उसका खोया हुआ सम्मान वापस मिल सकता है। पुस्तक पर विस्तृत समीक्षा युवा आलोचक और समीक्षक डॉक्टर आरिफ़ हसन वस्तवी ने प्रस्तुत की। मंच संचालन जमील अख्तर शाफ़िक ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन ज़फ़र आजम ने प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर सीपीआई की सक्रिय नेता मीना तिवारी, उर्दू एक्शन कमेटी के महासचिव अशरफ नबी कैसर, डॉक्टर जलाल असगर फरीदी, डॉक्टर मतीउर्रहमान अज़ीज़, आलीशान तैमी ने भी अपने विचार व्यक्त किए।विमोचन समारोह में दाऊदी इंटरनेशनल स्कूल के निदेशक डॉक्टर अल्तमश दाऊदी, आफताब आलम, जफर आजम,खालिद रहमानी, एजाज अहमद, ताबिश क़मर, इंजीनियरि साकीब क़मर, मतलूबूर रहमान, शफीकुर्रहमान, रेयाज खान,एहतशाम रहमानी, मोहम्मद एहसान, आलीशान तैमी, सईदूर रहमान, शमशाद सनाबली, शब्बीर अहमद इस्लाही, हकीम मुजफ्फर हुसैन अजमल म, मौलाना सादिक कासमी, मोहम्मद शाहिद, नीकहत हसन,मोहम्मद शमशाद, मोहम्मद मंजूर, अब्बास उर्फ़ गुड्डू, रेयाज नसरूल, मुफ्ती इरफान कासमी, कमर आज़म सिद्दीकी, ताबिश क़मर, अमीरुल्लाह, हाफिज़ अब्दुर्रहीम रहमानी, महफूज आरिफ़, ताज़ीम अहमद गौहर, शाकिर अली खान, शोएब अली रिज़वी, अब्दुल हई, मुफ्ती आफताब रश्क मिस्बाही, मोहम्मद इश्तियाक, डॉक्टर मंसूर मआसूम, क़ाज़ी वसीम ग़ाज़ी, रुकैया मुज़फ्फरपुरी, राबिया मुज़फ्फरपुरी, शहाबुद्दीन, सदरे इमाम अशरफ, मोहम्मद साहिल सहित बड़ी संख्या में शहर के विद्वान, उर्दू प्रेमी, छात्र-छात्राएं और श्रोता उपस्थित थे।