समाज सेवा की असल कसौटी पर चित्रगुप्त ऐसोसिएशन: मुज़फ़्फ़रपुर के कायस्थ परिवारों की भावनात्मक माँगें सामने आईं

प्रकाश सिन्हा । संपादक की कलम से ।

मुज़फ़्फ़रपुर में आगामी चित्रगुप्त ऐसोसिएशन चुनाव को लेकर जहाँ एक ओर चुनावी सरगर्मियाँ तेज़ हैं, वहीं दूसरी ओर समाज के बीच से कुछ अहम और भावनात्मक माँगें ज़ोर पकड़ रही हैं। स्थानीय कायस्थ परिवारों ने इस बार संगठन के दायित्वों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं और अपेक्षा की है कि ऐसोसिएशन सिर्फ़ औपचारिक आयोजनों तक सीमित न रहे, बल्कि जमीनी स्तर पर समाज की ज़रूरतों को भी समझे और पूरा करे।

परिवारों का कहना है कि आज मुज़फ़्फ़रपुर के अधिकतर कायस्थ परिवारों के सदस्य रोज़गार या शिक्षा के सिलसिले में शहर से बाहर रहते हैं। ऐसे में जब घर पर कोई अनहोनी या असामयिक दुर्घटना घटती है, तो परिवार पूरी तरह अकेला रह जाता है। उस कठिन घड़ी में कोई साथ नहीं होता – न आर्थिक मदद, न भावनात्मक सहारा। ऐसे में चित्रगुप्त ऐसोसिएशन को चाहिए कि वह समाज के नाम पर चलाई जा रही संस्था के तौर पर ऐसी परिस्थितियों में परिवारों की मदद की ज़िम्मेदारी उठाए।

इसके अलावा, कई बुज़ुर्ग कायस्थ नागरिक अकेलेपन और उपेक्षा का जीवन जी रहे हैं। परिवार के लोग बाहर रहने के कारण उनकी देखभाल नहीं हो पाती। वरिष्ठ नागरिकों का हाल-चाल लेने, उनके स्वास्थ्य और ज़रूरतों का ध्यान रखने के लिए ऐसोसिएशन को कोई स्थायी व्यवस्था करनी चाहिए।

एक और गम्भीर समस्या यह भी है कि समाज के कुछ आर्थिक रूप से कमजोर परिवार अपने प्रियजनों के निधन पर दाह संस्कार तक नहीं करवा पाते, क्योंकि उनके पास न तो आर्थिक साधन होते हैं और न ही कंधा देने वाले लोग। इस मानवीय संकट में चित्रगुप्त ऐसोसिएशन को आगे बढ़कर ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए और “चार कंधा, अंतिम विदाई” जैसी सामाजिक पहल की शुरुआत करनी चाहिए।

समाज के बुजुर्गों और ज़रूरतमंदों की ये माँगें अब सिर्फ़ सवाल नहीं हैं, बल्कि समाजिक ज़िम्मेदारी की कसौटी पर संगठन को परखने का माध्यम बन गई हैं।

अब देखने वाली बात ये होगी कि चित्रगुप्त ऐसोसिएशन और इसके प्रत्याशी इन भावनात्मक और ज़रूरी मुद्दों को अपने एजेंडे में शामिल करते हैं या नहीं।

समाज सेवा के नाम पर चल रही संस्था का असली मूल्यांकन अब होगा – जब वो सबसे ज़रूरतमंद वक्त में समाज के साथ खड़ी होगी।

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