प्रकाश सिन्हा (संपादक) की कलम से।
मुज़फ़्फ़रपुर | 1930 में स्थापित, कायस्थ समाज की ऐतिहासिक पहचान चित्रगुप्त ऐसोसिएशन आज बदहाली के दौर से गुजर रही है। शहर के प्रमुख और पॉश इलाक़े छाताचौक में स्थित यह संस्था, जो कभी सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करती थी, अब अपनी दुर्दशा और उपेक्षा के कारण चर्चा में है।

95 वर्षों की गौरवशाली विरासत रखने वाले इस संगठन की करोड़ों रुपये की संपत्ति आज रखरखाव के अभाव में जर्जर अवस्था में पहुँच चुकी है। स्थानीय कायस्थ समाज का एक बड़ा वर्ग अब यह सवाल कर रहा है कि आखिर इस ऐतिहासिक धरोहर की यह हालत किसकी ज़िम्मेदारी है?

वर्तमान कमेटी की कार्यशैली पर सवाल
समाज के भीतर से आवाज़ें उठ रही हैं कि ऐसोसिएशन की वर्तमान कमेटी पूरी तरह निष्क्रिय और मनमानी ढंग से काम कर रही है। साल में केवल एक बार — चित्रगुप्त पूजा के अवसर पर, एक सांकेतिक “भाई-भोज” आयोजित कर समाज को जोड़ने का औपचारिक प्रयास किया जाता है। लेकिन उससे आगे कोई सामाजिक, सांस्कृतिक या जनहितकारी गतिविधि न के बराबर देखी जाती है।

आमदनी और खर्च का नहीं होता खुलासा
समाज के लोगों का आरोप है कि ऐसोसिएशन की आमदनी और खर्चे का कोई पारदर्शी रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं किया जाता। न ही वार्षिक रिपोर्ट जारी होती है और न ही समाज को किसी प्रकार की जानकारी दी जाती है कि संस्था की करोड़ों की संपत्ति से क्या लाभ अर्जित होता है और उसका उपयोग किस कार्य में होता है।

कम होती समाज की भागीदारी
यह भी देखा गया है कि शहर के कायस्थ परिवार अब संस्था की गतिविधियों से कटते जा रहे हैं। इससे वर्तमान कमेटी को बिना जवाबदेही के कार्य करने का अवसर मिल रहा है। सामूहिक सहभागिता की कमी ने संगठन को कुछ गिने-चुने लोगों के हाथों की कठपुतली बना दिया है।

सवाल उठते हैं, जवाब नहीं मिलते
• क्या कभी इस धरोहर की मरम्मत या विस्तार की कोई योजना बनाई गई?
• संस्था की आमदनी का हिसाब-किताब कौन देखता है?
• जर्जर भवन में सुरक्षा मानकों का ध्यान क्यों नहीं रखा गया?
• समाज के बुज़ुर्गों, ज़रूरतमंदों और युवाओं के लिये संस्था क्या योगदान दे रही है?

समय की माँग: पारदर्शिता, भागीदारी और पुनर्जीवन
समाज के बुद्धिजीवियों और युवाओं की माँग है कि अब इस संस्था को पुराने ढर्रे से निकालकर एक सामाजिक उत्तरदायित्व से परिपूर्ण, पारदर्शी और सक्रिय संगठन में बदला जाए। एक ऐसी संस्था, जो अपने गौरवशाली इतिहास के साथ वर्तमान और भविष्य की ज़रूरतों को भी पूरा करे।

क्या आने वाले चुनावों में यह मुद्दा बनेगा?
जैसे-जैसे चित्रगुप्त ऐसोसिएशन के चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, इन सवालों के जवाब मांगने की आवाज़ें तेज़ हो रही हैं। क्या कोई ऐसा नेतृत्व सामने आएगा जो केवल पूजा आयोजन तक सीमित न रहकर, संस्था को समाज सेवा की असल मिसाल बना सके?
मुज़फ़्फ़रपुर की कायस्थ धरोहर की जर्जर तस्वीर अब बदलाव की माँग कर रही है — क्या समाज जागेगा?

