बिहार में 27 लाख लोग बाढ़ में घिरे, राहत शिविरों में दाल-भात तो है, मगर बच्चों का दूध और महिलाओं की जरूरत का सामान है गायब

बिहार में बाढ़ का कहर लगातार जारी है। राज्य के 13 जिलों में करीब 27 लाख लोग बाढ़ की चपेट में बताए जा रहे हैं। सरकार की ओर से बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत शिविर, भोजन और दूसरी जरूरी सुविधाएं मुहैया कराने के मुकम्मल इंतजाम का दावा किया जा रहा है, लेकिन जमीनी तस्वीर इन दावों से अलग नजर आ रही है। कई राहत शिविरों में दो वक्त दाल-भात-सब्जी तो मिल रही है, लेकिन बच्चों के लिए दूध, महिलाओं के लिए सैनिटरी पैड और चेंजिंग रूम जैसी बुनियादी जरूरतें अब भी पूरी नहीं हो पा रही हैं।

फुलवारी के धनकी इलाके में नियमित स्वास्थ्य जांच नहीं होने से बुजुर्गों और गंभीर मरीजों की परेशानी बढ़ गई है। वहीं बाढ़ अनुमंडल के एक कैंप में बनाए गए पांच शौचालयों की साफ-सफाई की हालत बेहद खराब बताई जा रही है। ऐसे में बाढ़ पीड़ितों को बीमारी और संक्रमण का खतरा भी सता रहा है।

सारण जिले के सात प्रखंडों के 109 गांवों में करीब 2.12 लाख लोग बाढ़ की चपेट में हैं। जान टोला, रावल टोला और सीढ़ी घाट जैसे इलाकों में शिशुओं के लिए दूध और महिलाओं के लिए टॉयलेट जैसी सुविधाओं की कमी सामने आई है। बाढ़ के बीच छोटे बच्चों और महिलाओं के लिए जरूरी सुविधाओं का अभाव राहत व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है।

समस्तीपुर के मोहिउद्दीननगर में राहत रसोई की स्थिति भी चिंताजनक है। यहां 65 रसोइयों को मंजूरी दी गई थी, लेकिन धरातल पर महज पांच रसोइयां चल रही हैं। भागलपुर के नाथनगर के पांच राहत शिविरों में पशुपालकों को अपने मवेशियों के चारे का इंतजाम खुद करना पड़ रहा है।सीवान में 164 राहत रसोइयां प्रस्तावित हैं, लेकिन जलस्तर बढ़ने का इंतजार किया जा रहा है और अब तक एक भी रसोई शुरू नहीं हुई है। गोपालगंज और बक्सर के सिमरी में भी स्वीकृत राहत शिविर और रसोई चालू नहीं हो सके हैं। सिमरी में 15 केंद्रों में से सभी बंद बताए जा रहे हैं।

इस बीच मौसम विभाग ने आज भी राज्य के छह जिलों में आंधी-बारिश का अलर्ट जारी किया है। बाढ़ से अब तक 20 से ज्यादा लोगों की मौत की बात सामने आ चुकी है। ऐसे में आने वाले दिनों में हालात और चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।बाढ़ पीड़ितों को सिर्फ पेट भरने के लिए भोजन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। बच्चों का दूध, महिलाओं की गरिमा और स्वच्छता, बुजुर्गों की चिकित्सा सुविधा तथा मवेशियों के चारे जैसी जरूरतें भी राहत व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। अब सवाल यही है कि कागजों पर मुकम्मल दिख रही राहत व्यवस्था जमीन पर कब दिखाई देगी?

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Discover more from Muzaffarpur News

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading