जिन लोगों को सजा हुई उनमें 52 शराब पीने वाले और 89 शराब बेचने वाले हैं. वहीं उत्पाद विभाग द्वारा दर्ज मुकदमों में सर्वाधिक मामले शराब पीने से जुड़े हैं. बिहार में शराबबंदी कानून के तहत अप्रैल 2016 से 12 सितंबर 2018 तक एक लाख 33 हजार, 339 मामले दर्ज किए गए हैं.
बिहार में शराबबंदी कानून को लेकर सरकार भले ही कितने दावे कर ले लेकिन हकीकत यह है कि पुलिस और उत्पाद विभाग इस जुर्म में सजा दिलावने में फिसड्डी साबित हो रहे हैं. इसी का नतीजा है कि 12 सितंबर तक शराब पीने और इसकी तस्करी के जुर्म में सिर्फ 141 लोगों को सजा हुई.
जिन लोगों को सजा हुई उनमें 52 शराब पीने वाले और 89 शराब बेचने वाले हैं. वहीं उत्पाद विभाग द्वारा दर्ज मुकदमों में सर्वाधिक मामले शराब पीने से जुड़े हैं. बिहार में शराबबंदी कानून के तहत अप्रैल 2016 से 12 सितंबर 2018 तक एक लाख 33 हजार, 339 मामले दर्ज किए गए हैं.
इनमें 52 हजार, 185 मामले उत्पाद विभाग ने दर्ज कराए जबकि पुलिस ने 81 हजार, 154 प्राथमिकी दर्ज की है. इस दौरान उत्पाद विभाग और पुलिस ने मिलकर एक लाख 61 हजार 620 व्यक्तियों को गिरफ्तारी की. इस मामले को लेकर सरकार विपक्ष के निशाने पर है. विपक्ष की माने तो इसी कानून को लेकर सरकार का पतन तय है.
विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव और जीतनराम मांझी ये आरोप लगाते आए हैं कि शराबबंदी के ज्यादातर मामलों में गरीबों और दलितों को फंसाया जा रहा है और शराबबंदी गरीब विरोधी है.
दो वर्ष से ज्यादा की अवधि में दर्ज इन मुकदमों में 30 हजार 711 यानी 51.88 प्रतिशत मामले पीनेवालों से संबंधित है. वहीं शराब बेचने के आरोप में 14 हजार 705 मामले दर्ज किए गए. इसका प्रतिशत 33.26 है जबकि शराब जमा करने और उसके परिवहन से जुड़े मामलों का प्रतिशत क्रमश: 8.90 और 5.96 प्रतिशत है.
जाहिर सी बात है कि सरकार का महकमा खुद सरकार की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया लेकिन सतारूढ़ दल इसे अपने नजरिये से देखना ज्यादा मुनासिब समझ रहा. लिहाजा उसे कही कोई कमी नजर नहीं आ रही.
ये हाल तब है जबकि सरकार ने स्पेशल कोर्ट का गठन कर आरोपियो को अधिक से अधिक सज़ा दिलाने की ठानी थी लेकिन स्पेशल कोट का प्रस्ताव फाइलों की शोभा बढाने में ही लगा है.