
MUZAFFARPUR : अक्सर देखा जा रहा है की जिस वक़्त पुलिस अप’राधियों पर नके’ल कसने की रणनी’तियों पर कार्य कर रही होती है, समीक्षा बैठक में व्यस्त होती है, ठीक उसी वक़्त अप’राधी भी अपनी कार’गुजारियों को अंजाम देकर निकल जाते हैं. यह पुलिस के सूच’ना तंत्र को ही सवालों के घेरे में खड़ा करता है साथ ही पुलिस की सक्रियता और पुलिस की का’र्यशैली को भी. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या पुलिस की लचर कार्यप्रणाली के चलते मुजफ्फरपुर जिले में अप’राधों की बाढ़ सी आ गई है? पुलिस अप’राध पर लगा’म और अप’राधियों पर आखिरकार नके’ल कैसे कसेगी. आम जनता को पुलिस यह बताने में नाकाम साबित हो रही है की जिले में अप’राधियों ने जो हल्ला बोल दह’शत कायम कर रखा है, उससे वह छुटकारा क्यों नहीं दिला पा रही है.

बीते मंगलवार 18 जून को तिरहुत रेंज के डीआईजी जब वैशाली, सीतामढ़ी, शिवहर और मुजफ्फरपुर के डीएसपी और एसडीपीओ के साथ सड़क दुर्घ’टनाओं में लगाम लगाने और बढ़ते अप’राध पर रणनी’ति बनाने हेतु समीक्षा बैठक में व्यस्त थे, इसी बीच करजा थाना क्षेत्र के रेवा रोड स्थित मड़वन सेन्ट्रल बैंक के सीएसपी केंद्र से मंगलवार दोपहर 3 बाइक सवार छह सश’स्त्र अप’राधियों ने पि’स्तौल के बल पर रक्सा निवासी सीएसपी संचालक रमेश कुमार से 2 लाख रूपए और मोबाइल लू’ट लिए. अपराधियों ने केंद्र के मेन गेट का शीशा तो’ड़कर घटना को अंजा’म दिया. मौके पर पहुंची करजा थाना पुलिस ने पुलिस की आप’राधिक घटना उपरांत होने वाली प्रक्रिया को पूरा करते हुए सीसीटीवी फुटेज खंगाला. उधर बोचहां थाना क्षेत्र के मुजफ्फरपुर दरभंगा फोरलेन एनएच 57 पर मझौली पेट्रोल पंप के समीप दो बाइक पर सवार हथि’यार से लैस 5 अप’राधियों ने हथौड़ी थाना क्षेत्र के कोठिया गाँव निवासी कवीन्द्र कुमार से बुलेट मोटरसाइकिल और न’गदी लू’ट ली.

अंधेरे में तीर मार कर पुलिस अप’राधियों को गिर’फ्तार करती है या फिर समय बीतने के साथ घटना को ठंडे ब’स्ते में डाल देती है. पिछले सात दिनों में दो व्यक्तियों की ह’त्या, काँटी में दो राजद नेताओं पर जा’नलेवा हम’ले के दौरान हुई फाय’रिंग में पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकी है. कई मामलों में सीसीटीवी फुटेज के बावजूद पुलिस के हाथ खाली हैं. दो महिलाओं से चेन छि’नतई के दौरान सीसीटीवी फुटेज में कैद बाइकर गैंग के अप’राधियों के हुलिए के बावजूद पुलिस उन्हें चि’न्हित नहीं कर सकी है.

घटना की पूर्व जानकारी दे सकें, पुलिस विभाग के पास ऐसे मुख’बिर नहीं हैं और जो हैं भी तो उनका भरोसा पुलिस अधिकारियों पर नहीं रहा. पुलिस के कम’जोर सूचना तंत्र के कारण शहर में ताबड़तोड़ आप’राधिक घट’नाएं घ’टित हो रहीं हैं. पुलिस सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सूचना तंत्र मजबूत बनाने के लिए पुलिस को मिसलेनियस फंड मिलता है. थाने के क्षेत्रफल के अनुपात में यह राशि 25 से 50 हजार रुपए तक होती है. जानकारों की माने तो यह राशि मुख’बिरों पर खर्च नहीं होती. अधिकांशतः पुलिस अधिकारी एकतरफा जानकारी देने वाले मौकापरस्त लोगों का सहारा ले रही है.

पहले मुख’बिर पुलिस के लिए जा’न जो’खिम में डाल कर काम करते थे. पूर्व के दिनों में पुलिस को पहले ही कई मामले की जानकारी हो जाती थी और बड़ी-बड़ी घट’नाएं घ’टित होने के पहले ही टल जाती थीं या घटित अप’राधों का चंद दिनों में ही उद्भेदन कर लिया जाता था. पुलिस कार्रवाई के दौरान अप’राधी भी पकड़े जाते थे. अब पुलिस से मुख’बिर दूर होते जा रहे हैं और अप’राध बढ़ता जा रहा है. अप’राध पर प्रभावी रूप के नियंत्रण के लिए पुलिस विभाग द्वारा सूचना तंत्र व मुख’बिर तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है. आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक यह है कि सुरक्षा बलों का सूचना तंत्र चुस्त-दुरुस्त रहे और इसके लिए आम जनता और पुलिस के बीच संवाद बेहद जरूरी है. सबसे महत्वपूर्ण यह है कि पुलिस का जनता के प्रति रवैया मित्रतापूर्ण हो.

समाज में विधि व्यवस्था कायम रखने और अप’राधों की छानबीन के लिए जरूरत है अलग-अलग ढंग से प्रशिक्षित सुर’क्षाक’र्मियों की. आधुनिक तरीकों का प्रशिक्षण, उन्नत हथि’यार, ऊंचा मनोबल, समृद्ध आत्मबल और सश’क्त चरित्र बल के आधार पर ही अप’राधों पर अंकुश लगाया जा सकता है. परंपरागत तरीकों से शातिर अप’राधियों को दबोचने की योजना में सफलता हमेशा संदि’ग्ध रहेगी ही. पुलिस के उन्नीसवीं शताब्दी के तंत्र को इक्कीसवीं शताब्दी के अनुरूप ढालने की शुरुआत किए बिना आंतरिक सुर’क्षा की चुनौतियों से नहीं निपटा जा सकता. ध्यान रहे कि लाठी से सिर्फ लकीर पीटी जा सकती है, अप’राधियों पर इसका कोई असर नहीं होता.

अप’राधों की प्रकृति पर नजर डाली जाए तो आभास होगा कि सामाजिक कारणों पर आर्थिक सरोकार हावी हो रहे हैं. शीर्ष अधिकारी अप’राधों में वृद्धि के कारणों और नियंत्रण के उपायों पर समीक्षा बैठक में गहन मंथन करके कारगर योजना बनाएं जाएं ताकि आमजन का विश्वास टूटने न पाए. पुलिस प्रशासन अपनी मौजूदगी का अहसास कराए बिना अप’राधियों पर नकेल नहीं कस सकती. पुलिस का रवैया इसी तरह रहा तो आने वाले दिनों में ऐसे मामलों में जनआ’क्रोश को संभाल पाना शासन प्रशासन के लिए मुश्किल कार्य होगा.
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