‘आर्टिकल 15’ संविधान का वह हिस्सा है जिसमें धर्म, जाति, भाषा, रंग या लिंग के आधार पर भेदभाव की सख्त मनाही है। इसी संविधान ने आरक्षण देकर देश को जातियों में बांटने का भी काम किया। एक ही किताब के दो अलग अलग तवों पर सुलगती गेहूं और बाजरे की रोटी की गंध महसूस करना ही ‘आर्टिकल 15’ देखना है।
गौरव सोलंकी की कहानी, अनुभव का निर्देशन और आयुष्मान का अभिनय, ये तीनों बातें इस फिल्म को एक दस्तावेज बनाती हैं। बड़े स्कूल में पढ़ा, विदेश में कढ़ा कोई युवक क्यों आईपीएस बनना चाहता है? गांवों में पूछिए तो अब भी सरकारी नौकरी का मकसद देश की सेवा नहीं बल्कि रि’श्वत की मेवा कमाना है। 25 हजार की सिपाही की नौकरी की रि’श्वत 15 लाख रुपये तक जा सकती है।

‘आर्टिकल 15’ का आईपीएस इस मिथ को तो’ड़ता है। अशोक की लाट लिए कंधे पर घूमते अफसर के सिर पर जाति व्यवस्था की दो ला’शें झूलती दिखती हैं तो स्टॉक एक्सचेंज के लाल-हरे पर नजरें टिकाए रहने वाले इंडिया से आगे के भारत का संवेदी सूचकांक दिखता है। यह वह सूचकांक है जो नेताओं की मर्जी से घटता बढ़ता है। इंसान यहां किसी शेयर के भाव से ज्यादा अहमियत रखता भी नहीं है।
तीन रूपये भाव बढ़ाने की कोशिश हुई और बदले में मिलती है हैवानियत। ‘आर्टिकल 15’ में राजनीति जैसे दलदल से गुजरते पुलिस वालों का दृश्य याद रहे न रहे, गटर से निकलता इंसानी सिर आपको ताजिंदगी याद रहेगा। विकास की शायद यही असली तस्वीर है। फिल्म आपके भीतर जो कुछ भी है, उसे नए तरीके से सेट करने की कोशिश करती है।

फिल्म में अनुभव के सुख दुख के साथी मनोज पाहवा ने फिर दम दिखाया है। कुमुद मिश्रा का अपना सेट पैटर्न है। ईशा तलवार गेहूं के खेतों में फिल्माए गए गाने में सुंदर दिखी हैं। सयानी गुप्ता हिंदी सिनेमा में धीरे धीरे जगह बना रही हैं, उनका काम प्रभावित करता है। प्रभावित करने लायक फिल्म में इवान मुलिगन की फोटोग्राफी भी है।
इवान का कैमरा फिल्म का सबसे बड़ा किरदार बनकर उभरा है। बड़े कैनवस पर बनी और हर दिन करोड़ों की कमाई कर रही ‘कबीर सिंह’ का हैंगओवर उतारने के लिए ‘आर्टिकल 15’ जैसी फिल्में बहुत जरूरी हैं। ये आपको बताती हैं कि हॉटस्टार पर वर्ल्डकप मैच के अलावा भी कुछ ऐसा हो रहा है जिसे देखना बनता है।