अगर किसी जातक की जन्मकुंडली में शनि नीच राशिगत, वक्री, अशुभ स्थान का स्वामी होकर अशुभ ग्रहों के प्रभा’व में हो तो शनि अपनी महादशा, अंतर्दशा, साढ़ेसाती या ढैया अवधि, जन्म, शनि पर गोचर या शनि का गोचर होने पर अशुभ फल देता है।

शनि के अशुभ फल : व्यवसाय, नौकरी व कार्यों में बा’धाएं, अस्वस्थता, मानसिक अशांति, पारिवारिक अशांति, धन-संचय में कमी, प’रेशानीपूर्ण यात्राएं, मित्रों से मतभेद, संतान संबंधी चिंता, सट्टा में हा’नि, श’त्रुओं द्वारा परे’शानी, मु’कदमा-बाजी, लाभ व मान प्रतिष्ठा में बा’धाएं, धन आगमन अव’रुद्ध होना, व्यय का योग अधिक, हा’नि, ऋण में डू’बना आदि।
ग्रहों की अशुभता को दूर करने के लिए उनसे संबंधित मंत्रों के जाप करने से सफलता मिलती है। साथ ही ग्रह विशेष के मंत्र जाप से ग्रह की शुभता एवं बल में वृद्धि होती है। ज्योतिष के अनुसार शनिवार के दिन शनि की पूजा विशेष रूप से की जाती है। इस दिन कोई नया काम शुरू नहीं करना चाहिए।

शनिवार को अखंड नारियल नदी में प्रवाहित करने से शांति मिलती है। प्रत्येक शनिवार को हनुमान चालीसा का पाठ करने तथा शनिदेव के दर्शन कर तेल चढ़ाने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं।
