मुजफ्फरपुर। मुजफ्फरपुर सहित कई जिलों से हर महीने भेजी गई रिपोर्ट ने साक्षरता कार्यक्रम में गड़बड़ी और कागजी खेल उजागर किया है। हुआ यूं कि कोरोना के कारण स्कूल बंद में भी बच्चों को स्कूल में ठहराव से लेकर साक्षरता केंद्रों पर महिलाओं की उपस्थिति दिखा दी गई।
35 से अधिक उम्र की वंचित समुदाय और अल्पसंख्यक महिलाओं को साक्षर बनाने और इनके बच्चों को भी पढ़ाई से जोड़ने को साक्षरता कार्यक्रम चलाए जा रहे है। बताया जाता है कि जिले में 620 साक्षरता केंद्र बनाए गए हैं। इन केंद्र को चलाने को टोला सेवक और तालीमी मरकज के शिक्षा सेवियों की भी बहाली की गई है।
हर महीने इन केंद्रों से संबंधित रिपोर्ट विभाग ने मांगी थी। निदेशक ने जवाब मांगा है कि कागजी खेल में अधिकारियों की भूमिका भी घेरे में है। जिस योजना पर साल में करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, उसकी रिपोर्ट तक की जांच नहीं की जा रही है। मनमाने तरीके से रिपोर्ट बनाकर भेजी जा रही है। एक साक्षरता केंद्र पर 20 महिलाएं नामांकित है, मगर परीक्षा के दौरान एक केंद्र पर 300 तक महिलाओं का शामिल होना दिखाया गया।
औरंगाबाद, अररिया समेत अन्य कई जिले घेरे में है। यही नहीं, वैशाली में अधिकतर साक्षरता केंद्र किसी घर के दरवाजे पर संचालित दिखाये गये हैं, जबकि इसे स्कूल में चलाना है।
मुजफ्फरपुर से परीक्षा संबंधित रिपोर्ट में सुधार कर दोबारा उसे भेजा ही नहीं गया। कई जिलों से दोबारा भेजी रिपोर्ट में भी गड़बड़ियां है। गया में 27 से अधिक नवसाक्षरों का प्राप्तांक एक ही है। कई जिलों में 14 मार्च को आयोजित बुनियादी साक्षरता परीक्षा के नाम पर भी हुआ खेल उजागर हुआ है। मार्च में परीक्षा 50 अंक की हुई, लेकिन उसमें महिलाओं को 70 अंक तक मिल गया है।
यहीं नहीं, वेतन पाने वाले और हर महीने की भेजी गई टोला शिक्षण सेवियों की संख्या में भी अंतर सामने आया है। जनशिक्षा निदेशक सतीश चंद्र झा ने मुजफ्फरपुर समेत सभी जिलों के एसआरपी और डीपीओ साक्षरता से इस मामले में जवाब मांगा है। डीईओ अब्दुस्सलाम अंसारी का कहना है कि जिन बिंदुओं पर आपत्ति आई है, उनकी जांच कराई जा रही है। इस मामले में डीपीओ से भी जवाब मांगा गया है। सौजन्य: हिन्दुस्तान