मुजफ्फरपुर। तापमान बढ़ने के साथ ही बच्चों के लिए जानलेवा बनी एईएस के कारण का पता नहीं चल सका है। एसकेएमसीएच में भर्ती होने वाले 20 बच्चों का ब्लड सैंपल व रीड की हड्डी का पानी जांच के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट आफ वायरोलाजी (एनआइवी) लैब पुणे भेजा गया था। लैब ने रिपोर्ट केंद्रीय रिसर्च टीम को सौंप दी हैं।
जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चों के ब्लड सैंपल में किसी भी प्रकार का कोई वायरस नहीं है। केंद्रीय रिसर्च टीम को आशंका थी कि वायरस से संक्रमण बच्चों में हो नहीं रहा है। बच्चों में चमकी बुखार से हो रहे मौत का कारण पता करने के लिए राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के सलाहाकार एम्स जोधपुर के नवजात शिशु रोग विभागाध्यक्ष डा. अरुण कुमार सिंह के नेतृत्व में केंद्रीय रिसर्च टीम 2019 में आई थी।
यह टीम तीन प्रखंड में जाकर बीमारी का कारण पता कर रही है। इसमें सबसे अधिक बीमार होकर आने वाले कांटी, मीनापुर और मुशहरी में टीम जाकर लीची, गर्मी और रात को भूखे पेट बच्चों के सोने के कारण हो रही बीमारी पर काम किया था। रिसर्च टीम में शामिल दल ने 10 गांवों में जाकर रिसर्च किया था। सड़े गले फल में टाक्सिन होता है, जिससे शुगर की कमी होती है।
जांच में इस बात की पुष्टि नहीं हुई कि जो टाक्सिन सड़े-गले फलों में जो टाक्सिन होता है वह बीमार बच्चे के अंदर पाई जा रही है, लेकिन रिपोर्ट में कोई वायरस व अन्य कारण का पता नहीं चला। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के सलाहाकार डा. अरुण कुमार सिंह की मानें तो बीमारी में मस्तिष्क का इन्फेक्शन, मस्तिष्क में मलेरिया और दिमागी बुखार से बच्चा पीड़ित हो जाता है।
इससे ब्लड में शुगर की कमी हो जाती है और ब्रेन डैमेज होने लगता है। इससे बच्चे की मौत हो जाती है। अधिकांश पीड़ित का शुगर लेवल कम हैं। डा.सिंह ने बताया कि अब बच्चों की जीनोमिक्स जांच होगी। उन्होंने बताया कि वह लगातार यहां आते रहते हैं। टीम में उनके साथ डा.विजय किरण रेड्डी, उपेंद्र प्रसाद रजक, धर्मेश कुमार और मनीष कुमार शामिल हैं। डा. सिहं ने कहा कि जीनोमिक्स एक विज्ञान है, जिसमें हम आर-डीएनए, डीएनए अनुक्रमण तकनीक व जैव सूचना विज्ञान का उपयोग कर जीनोम की संरचना, कार्य एवं अनुक्रमण का अध्ययन करते हैं। यह विधा जीवों के संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण का पता लगाने का प्रयास है। जो इस बार होगा
