अतुल्य विरासत को हैं संरक्षण की आवश्यकता , जानें पूरा मामला…

समस्तीपुर। समस्तीपुर को मिथिला का प्रवेश द्वार कहा जाता। राजा जनक के मिथिला प्रदेश का अंग रहा। विदेह राज्य का अंत होने पर यह वैशाली गणराज्य का अंग बना। इसके बाद मगध के मौर्य, शुंग, कण्व और गुप्त शासकों के महान साम्राज्य का हिस्सा रहा। ह्वेनसांग के विवरणों से यह पता चलता है कि यह प्रदेश हर्षवर्धन के साम्राज्य के अंतर्गत था।

13वीं सदी में पश्चिम बंगाल के मुसलमान शासक हाजी शम्सुद्दीन इलियास के समय मिथिला एवं तिरहुत क्षेत्रों का बंटवारा हो गया। उत्तरी भाग सुगौना के ओईनवार राजा (1325-1525 ईस्वी) के कब्जे में था, जबकि दक्षिणी एवं पश्चिमी भाग शम्सुद्दीन इलियास के अधीन रहा। इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि समस्तीपुर का नाम भी हाजी शम्सुद्दीन के नाम पर पड़ा। उजियारपुर प्रखंड स्थित देवखाल के बारे में मान्यता है कि यहां यक्ष व युधिष्ठिर के बीच संवाद हुआ था। पांडव हस्तिनापुर से सुरंग के माध्यम से भटकते हुए इसी चौर में पहुंचे थे।

 

इसी वजह से दलसिंहसराय में एक स्थान पर किले में ठहरे थे। जहां पर पांडुकालीन मुद्राएं भी मिली थीं। इसी वजह से इस स्थान का नाम पांडव स्थान रखा गया। पटोरी के धमौन में दरिया पंथियों को सबसे बड़ा स्थल संत दरिया आश्रम है। पटोरी के ही शिउरा में निषादों का सबसे बड़ा तीर्थस्थल अमर सिंह स्थान तथा यादवों का तीर्थस्थल निरंजन स्थान है। मोहिउद्दीननगर में आयसा बीबी का किला है।

 

मोरवा में सांप्रदायिक एकता की मिसाल खुदनेश्वर स्थान में ग्रामीणों ने मिलकर एक भव्य मंदिर बनवाया है। शिव के अनन्य भक्त एवं महान मैथिल कवि विद्यापति ने यहां गंगा तट पर अपने जीवन के अंतिम दिन बिताए थे। मान्यता है कि बीमारी के कारण विद्यापति जब गंगातट जाने में असमर्थ थे तो गंगा ने अपनी धारा बदल ली और उनके आश्रम के पास से बहने लगीं।

 

दलसिंहसराय में हुई खुदाई में महाभारतकालीन वस्तुएं मिली हैं। शिवाजीनगर में महामहिषी कुमारिलभट्ट के शिष्य महान दार्शनिक उदयनाचार्य का जन्म 984 ईस्वी में शिवाजीनगर प्रखंड के करियन गांव में हुआ था। उदयनाचार्य ने न्याय, दर्शन एवं तर्क के क्षेत्र में लक्षमणमाला, न्यायकुशमांजिली, आत्मतत्वविवेक, किरणावली आदि पुस्तकें लिखीं। इन पर अनगिनत संस्थानों में शोध चल रहा। विश्व विरासत दिवस प्रत्येक वर्ष ’18 अप्रैल’ को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को ने हमारे पूर्वजों की दी हुई विरासत को अनमोल मानते हुए और इन्हें सुरक्षित रखने के उद्देश्य से ही इस दिवस को मनाने का निर्णय लिया था।

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