क्रूड के लुढ़कने से भारत को होगा क्या फायदा ? जानिए…

नई दिल्ली। ओपेक देशों में प्रोडक्शन कट को लेकर असहमति, अमेरिका का लगातार उत्पादन बढ़ाना, रुस का प्रोडक्शन कट को राजी न होना और दुनियाभर में अर्थव्यवस्थाओं का सुस्त होना ऐसे तमाम कारण हैं जो फिसलते क्रूड के लिए जवाबदेह हैं। क्रूड के गिरने से चिंतित देशों की मुश्किलें आगे भी थमती नहीं दिख रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि क्रूड में आगे और भी गिरावट देखने को मिल सकती है। खैर क्रूड को लेकर जारी तमाम अनिश्चितताओं के बीच भारत में पेट्रोल-डीजल का सस्ता होना जारी है और अगर क्रूड इसी तरह लुढ़कता रहा तो पेट्रोल-डीजल आम आदमी को और भी राहत दे सकता है। हमने कमोडिटी एक्सपर्ट अजय केडिया से इस विषय पर विस्तार से बात की है।

फिसलते क्रूड की प्रमुख वजहें:

केडिया ने बताया कि फिलहाल दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं में सुस्ती सी छाई हुई है। फिर वो चाहे चीन हो, भारत हो, यूरोपियन यूनियन हो या फिर अमेरिका। चीन क्रूड ऑयल का सबसे बड़ा आयातक माना जाता है, लेकिन अब चीन की मांग में कमी आई है। वहीं अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वार ने अनिश्चितताएं और बढ़ाई हैं। इन्हीं कारणों के चलते क्रूड फिसल रहा है।
क्रूड की मौजूदा स्थिति को लेकर सबसे मुश्किल सवाल बेलगाम सप्लाई है। दिलचस्प बात है कि 2 वर्ष पहले जो तेल का आयात करता था वही अमेरिका आज दुनियाभर को अपना तेल बेच रहा है। ओपेक प्रोडक्शन कट की वकालत कर रहा है लेकिन रुस और अमेरिका लगातार अपना उत्पादन बढ़ा रहे हैं। वहीं ओपक से देशों का निकलना मुश्किल सवाल खड़े कर रहा है। यानी कुल मिलाकर दुनियाभर में क्रूड की ओवर सप्लाई हो चुकी है लेकिन खपत उतनी नहीं है। इस वजह से कीमतें गिर रही हैं।
इसके अलावा दुनियाभर के देशों में इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर बढ़ रही जिज्ञासा, मांग और भविष्य में संभावित अनिवार्यता भी क्रूड को कमजोर करने का काम कर रही है।


बीते कुछ वर्षों में क्रूड ने तेज उछाल के साथ ही तेज गिरावट दिखाई है। वर्ष 2016 में जो ब्रेंट क्रूड 30 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था, वहीं 2017 में 60 और 2018 में 80 डॉलर प्रति बैरल तक के स्तर पर आ गया था। ऐसे में जिन फंड हाउसेज ने ऑयल में निवेश कर रखा था उन्होंने अपना मुनाफा 2 गुना से ज्यादा होते ही 2016-18 के दौरान प्रॉफिट बुकिंग कर अन्य सस्ते विकल्पों में अपना पैसा लगाना शुरु किया जैसा कि गोल्ड। यह भी क्रूड में गिरावट की बड़ी वजह है।
आखिर कहां तक गिर सकता है क्रूड?

क्रूड की अगर वर्तमान स्थिति की बात करें तो सोमवार को ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई दोनों में 6 फीसद से ज्यादा की गिरावट देखने को मिली। वर्तमान में डब्ल्यूटीआई क्रूड 42.68 डॉलर प्रति बैरल और ब्रेंट क्रूड 50.49 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा है। केडिया ने बताया कि अगर क्रूड में यही गिरावट जारी रही तो ब्रेंट क्रूड 40 से 42 डॉलर प्रति बैरल तक का स्तर छू सकता है।

क्रूड में गिरावट का भारत पर असर?
क्रूड की गिरावट का भारत को सबसे बड़ा फायदा यह हो रहा है कि भारत का रुपया लगातार मजबूत हो रहा है। वर्ष 2018 में बेशक रुपया 15 फीसद तक की गिरावट दिखा चुका है, लेकिन नवंबर दिसंबर के दौरान इसमें 6 फीसद का करेक्शन भी आ चुका है। पूर्व की बात करें वर्ष 2013 (सितंबर) में रुपया डॉलर के मुकाबले 70 के स्तर पर था, लेकिन नई सरकार के आते ही 12 मई 2014 को रुपया 58.32 के स्तर पर आ गया। वहीं 2019 में भी रुपये के और मजबूत होने के आसार नजर आ रहे हैं। अजय केडिया का मानना है कि अगर क्रूड में ऐसी ही गिरावट जारी रही तो पेट्रोल-डीजल में 8 से 10 रुपये प्रति लीटर तक की गिरावट देखने को मिल सकती है।

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