सीवान जिले के सिसवन प्रखंड में प्रसिद्ध बाबा महेन्द्रनाथ मंदिर अटूट विश्वास और आस्था का केंद्र माना जाता है। इस मंदिर में प्रतिदिन खासकर शिवरात्रि के दिन यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु बाबा के दर्शन हेतु आते है। इस मंदिर के साथ ही एक सरोवर है कहा जाता है कि सच्चे मन से इस सरोवर में स्नान करने से चर्म रोगों से मुक्ति मिलती है।

लोग बताते हैं कि सत्रहवीं शताब्दी में नेपाल नरेश महेंद्रवीर को कुष्ठ रोग हो गया था। इस रोग से मुक्ति के लिए नेपाल नरेश वाराणसी गंगा स्नान हेतु आ रहे थे। इस यात्रा के दौरान वह घनी जंगल में एक पीपल वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे। उस समय नेपाल नरेश को बहुत तेज प्यास लगी। वह पानी की तलाश में इधर-उधर भटकने लगे। तभी उन्हें एक गड्ढा मिला। नेपाल नरेश ने पानी पीने के लिए जैसे ही गड्ढे में हाथ डाला तो उनका कुष्ट रोग ठीक हो गया।

बीमारी ठीक होने पर राजा ने मंदिर का कराया निर्माण
बीमारी ठीक होने के बाद राजा काफी प्रभावित हुए इसके बाद नेपाल नरेश ने उस पानी से स्नान भी किया। जिससे उनका कुष्ठ रोग ठीक हो गया। उसी रात उनके स्वप्न में महादेव (शिव) ने पीपल वृक्ष के नीचे खुदाई करा मंदिर का निर्माण कराने की बात कही थी। इसके बाद नेपाल नरेश ने इस स्थान पर खुदाई कराई, जिससे शिवलिंग निकला। इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया गया,जिसे आज लोग महेन्द्रनाथ मंदिर के नाम से जानते हैं। जबकि मंदिर के समीप में ही एक विशाल जलाशय खुदवाया, जिसमें रोजाना सैकड़ों लोग आस्था की डुबकी लगाते हैं।

मंदिर के निर्माण के लिए राजा के द्वारा उस कीचड़ नुमा गड्ढे के पास स्थित पेड़ को लकड़हारे के द्वारा कटाई की जा रही थी। उस समय कुल्हाड़ी से शिवलिंग पर पड़ा था। अब भी शिवलिंग पर उस कुल्हाड़ी का निशान विराजमान है। मंदिर के प्रधान मठाधीश तारकेश्वर गिरी ने बताया कि इस मंदिर में अबतक कुल 26 महंतो की समाधि विराजमान है। यहां सच्चे मन से पहुंचे श्रद्धालुओं की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।
