पटना के गोला रोड का 11 साल का राहुल (बदला हुआ नाम) अपने स्कूल बैग के वजन से परेशान रहता था। सुबह-शाम 8 से 9 किलो का बैग लेकर स्कूल आने जाने में पसीना छूट जाता। दो माह पहले उसकी गर्दन में बैग के बोझ से अकड़न महसूस होने लगी। इसके बाद वह यूट्यूब पर वीडियो देखकर घर पर ही योग अभ्यास से उसे ठीक करने के प्रयास में जुट गया। बच्चे ने 15 दिन तक बिना किसी देख-रेख में शीर्षासन और अन्य एक्सरसाइज की थी, लेकिन उसकी गर्दन पूरी तरह से टेढ़ी हो गई।

पुष्पा फिल्म के पुष्पा राज की तरह टेढ़ी हुई छात्र की गर्दन घर वालों के लिए बड़ी समस्या हो गई। स्कूल से लेकर मोहल्ले के बच्चे भी ‘झुकेगा नहीं’ कहकर कमेंट करने लगे। फिर इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में डेढ़ महीने तक इलाज के बाद छात्र की गर्दन अब सीधी हुई है। इलाज करने वाले डॉक्टरों ने चौंकाने वाला खुलासा किया है, यू्ट्यूब वीडियो से इलाज में मर्ज बढ़ाने वालों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। यह कहानी सिर्फ 11 साल के राहुल की नहीं है, बल्कि घर-घर की है। बच्चों को छोटी उम्र से ही मोबाइल की लत लग जा रही है।

इंटरनेट से ऐक्सपैरिमैंट करने लगते हैं बच्चे
IGIMS के फीजियोथेरैपी विभाग के डॉ रत्नेश चौधरी का कहना है कि यूट्यूब और अन्य माध्यमों से वीडियो देख लोग खुद से इलाज कर रहे हैं। डॉक्टर का कहना है कि आए दिन ऐसे मामले आ रहे हैं, जिन्होंने वीडियो देखकर इलाज करने में अपनी सेहत गंवाई है

डॉक्टर रत्नेशन ने बताया कि यूपीएससी की तैयारी करने वाले एक स्टूडेंट ने कमर दर्द में यूट्यब से वीडियो देखकर खुद से एक्सरसाइज का प्रयास किया। स्टूडेंटस का दर्द ऐसा बढ़ा कि उसकी जरूरी परीक्षा भी छूट गई।गलत एक्सरसाइज करने से कमर का दर्द काफी बढ़ गया और फिर उसे एक सप्ताह तक फीजियोथेरैपी करानी पड़ी। डॉक्टर रत्नेश चौधरी का कहना है कि लॉकडाउन और ऑनलाइन पढ़ाई के चक्कर के बाद बच्चों के हाथ में मोबाइल से यह समस्या आई है। डॉक्टरों ने बच्चों ने गार्जियंस से अपील की है कि इन दिनों गर्मी की छुट्टी हुई है, इस समय बच्चों को अधिक समय तक मोबाइल नहीं दें। मोबाइल के साइड इफेक्ट बढ़ रहे हैं, इसलिए सतर्क रहें।

99.9 % बच्चे रोजाना मोबाइल पर रह रहे दो घंटे
पेरेंट्स बच्चों को कभी गेम खेलने के लिए तो कभी अपनी जान छुड़ाने के लिए यूट्यूब पर गाने या कविता लगा कर मोबाइल पकड़ा देते हैं। यह लत भी इतनी बढ़ जाती है कि फिर उन्हें मोबाइल न मिलने पर वे जान लेने या देने पर आ जाते हैं। भारतीय बाल अकादमी की ओर से कोविड काल में यह खुलासा हुआ था कि देश भर में 18 माह से कम उम्र के 99.9 प्रतिशत बच्चे रोजाना मोबाइल पर दो घंटे से ज्यादा वक्त गुजारते हैं। इसका दुष्प्रभाव बच्चों की आंखों के साथ दिमाग के विकास और व्यक्तित्व पर पड़ रहा है।

मार्च में पहले सरकार ने संसद में बताया कि देश में 23.8 फीसदी बच्चे रात में सोने से पहले स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं। लोकसभा में इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने बताया कि देश में 37.15 फीसदी बच्चों पर स्मार्टफोन्स का बुरा असर देखा जा रहा है। इन बच्चों की एकाग्रता के स्तर में कमी का अनुभव किया गया है। मोबाइल की लत से उनके सामने इंटरनेट वाली दुनिया खुल जाती है, जहां से वे किसी भी तरह की नॉलेज ले सकते हैं। यह गलत भी हो सकता है और सही भी। कई बच्चे पढ़ाई के वीडियो देखते हैं तो कई अन्य जानकारियों के लिए। इंटरनेट से मिलने वाले ज्ञान का कोई फीडबैक नहीं होता जिससे उस पर पूरी तरह से भरोसा करना खतरनाक हो जाता है। सबसे अधिक खतरा खुद से इलाज करने वालों का होता है।