दुनिया में तेजी से विलुप्त हो रहे भोजपत्र के पेड़, हिमालय की वादियों में लहलहा रहे हैं। भोज पत्र के पेड़ कभी गंगोत्री से आगे गोमुख पैदल मार्ग पर चीड़वासा और इससे ऊपरी क्षेत्र में दिखाई देते थे। वहीं अब ये वृक्ष 11 किमी नीचे गंगोत्री नेशनल पार्क के गेट कनखू बैरियर के पास देवगाड में भी दिखाई दे रहे हैं।

गंगोत्री नेशनल पार्क के अधिकारियों के अनुसार, 2008 में गंगोत्री ग्लेशियर की सुरक्षा के लिए लगाए गए कड़े प्रतिबंधों के चलते ये सकारात्मक परिणाम निकला है। भागीरथी (गंगा) के उद्गम स्थल गोमुख गंगोत्री ग्लेशियर को बचाने के लिए साल 2008 में गोमुख जाने वाले तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की संख्या 150 प्रतिदिन तय कर दी गई थी।

गोमुख जाने वाले रूट पर दिखना शुरू हो जाते हैं पेड़
गोमुख जाने वाले ट्रैक रूट पर चीड़वासा से भोजपत्र के पेड़ दिखना शुरू होते हैं। चीड़वासा के बाद भोजगढ़ी और भोजवासा में यह पेड़ दिख जाते हैं। भोजपत्र के पेड़ों की अधिकता के चलते ही इस स्थान का नाम भोजवासा पड़ा था। वर्तमान समय में भोजवासा से डेढ़ किमी आगे तक भोजपत्र के पेड़ मौजूद हैं, लेकिन अब गंगोत्री नेशनल पार्क के गेट कनखू बैरियर से पांच किमी आगे देवगाड तक इनका विस्तार देखने को मिल रहा है।

भोजपत्र के पेड़ों का विस्तार हिमालय के पर्यावरण के लिए लाभदायक
हाल में, गंगोत्री नेशनल पार्क के उप निदेशक आरएन पांडे के नेतृत्व में अधिकारी और वन कर्मियों की एक टीम गोमुख का भ्रमण कर लौटी है। गंगोत्री के वन क्षेत्राधिकारी प्रताप पंवार ने भोजपत्र के पेड़ों के विस्तार को हिमालय के पर्यावरण और जैव विविधता के लिए लाभदायक बताया।

जलवायु परिवर्तन के कारण खतरे की जद में आ गए थे
जलवायु परिवर्तन और पेड़ों के कटने से हिमालय की कई वनस्पतियां खतरे में आ गई हैं। भोजपत्र के पेड़ इसमें शामिल हैं। 80 के दशक में भोजपत्र के जंगल नाम मात्र को बचे थे, लेकिन अब भोजपत्र के हरे-भरे पेड़ दिखाई दे रहे हैं।

