मुजफ्फरपुर : दीपावली की रात दरवाजे पर कंदील जलाने और आसमान में उड़ाने की परंपरा वर्षों पुरानी है, जिसे उत्तर बिहार के शिवहर, सीतामढ़ी और समस्तीपुर में आज भी सहेज कर रखा गया है। आधुनिकता का रंग चढ़ने के बावजूद इन जिलों में परंपरा का निर्वहन करते हुए कंदील बनाई जा रही है।
षट्कोण, हवाई जहाज, कलश, घड़ा आदि आकार की बन रही हैं। शिवहर के महारानी स्थान, ब्रह्मस्थान और देवी स्थान के लिए लोग कंदील बनवाते हैं। शहर से सटी बस्ती में करीब दो हजार लोग कंदील निर्माण में लगे हैं।
आकार और डिजाइन के अनुसार एक कंदील की कीमत 100 से 500 रुपये तक है, जबकि इन्हें बनाने में मात्र 25 से 30 रुपये खर्च आता है।
शिवहर के कलाकर गणेशी सदा के पुत्र जगमोहन कहते हैं कि हमें खुशी है कि दीपावली पर कंदील जलाने की परंपरा और कला, दोनों जिंदा है। धनकौल निवासी अशर्फी सदा का कहना है कि जमाना भले ही हाईटेक हो गया है, पर कुछ परंपराएं आज भी बरकरार हैं। कंदील इसी का प्रतीक है।
सीतामढ़ी में भी कंदील का निर्माण और बिक्री खूब होती है। बांस आधारित सामग्री का निर्माण करने वाले टोलों में लोग दीपावली पर कंदील का निर्माण कर बेचते हैं।
सीतामढ़ी-शिवहर के कंदील बनाने वाले लोग एक सीजन में दो से तीन लाख की कमाई कर लेते हैं। इधर, समस्तीपुर के रोसड़ा में वेणु शिल्पकार सुनील कुमार राय 12 साल से कमाची से विभिन्न प्रकार के आकाशदीप का निर्माण कर रहे हैं।





