पटना.हेमंत सोरेन सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए झारखंड विधानसभा से आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 77 प्रतिशत करने संबंधी एक विधेयक को जैसे ही पास कराया, बिहार में भी इसकी गूंज सुनाई देने लगी है. बिहार में भी पचास प्रतिशत का दायरा बढ़ाने की मांग तेज होने लगी है.
दरअसल कुछ दिन पहले ही नीतीश कुमार से जब EWS पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल किया गया था तब उन्होंने फैसले का स्वागत तो किया ही था, लेकिन ये मांग भी उठाई थी कि पचास प्रतिशत का दायरा भी अब बढ़ना चाहिए. जाहिर है ये बयान नीतीश कुमार ने कुछ दिन पहले ही दिया था और उसके बाद से ही ये कयास तेज हो गए थे कि क्या नीतीश कुमार ने संकेत दे दिए है कि बिहार में भी पचास प्रतिशत का दायरा बढ़ा सकता है. अभी इस बात की चर्चा चल ही रही थी कि झारखंड की हेमंत सरकार ने दायरा बढ़ा कर 77 प्रतिशत कर दिया. जिसके बाद बिहार में भी इसकी मांग तेज हो गई है.
जेडीयू के संसदीय बोर्ड के प्रेसिडेंट उपेन्द्र कुशवाहा ने भी हेमंत सोरेन सरकार के फैसले की तारिफ की और कहा की ऐसा फैसला केंद्र की सरकार को जल्द से जल्द करना चाहिए ताकि कोई राज्य सरकार अगर दायरा बढ़ाए तो कोई कानूनी पेंच ना फंसे. इसके लिए जदयू केंद्र की सरकार पर दबाव भी बढ़ाएगी. वही राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी कहते हैं कि इस पर कोई भी फैसला महागठबंधन के बड़े नेता करेंगे. जो बिहार की जनता के हित में होगा.
जाहिर है महागठबंधन इस मामले पर सधे हुए तरीके से आगे बढ़ना चाहती है और हर पहलू को देखना चाहती है. वहीं महागठबंधन के नेताओ के बयान पर बीजेपी ने भी सधी हुई प्रतिक्रिया दी है और कहा कि जब पिछले तीस साल से मुख्यमंत्री थे उन्होंने अपने समय में क्यों नहीं फैसला किया जो भी हुआ वो 2005 के बाद एनडीए सरकार आने के बाद ही हुआ, जब अतिपिछड़ा, दलित और EWS को आरक्षण मिला. बिहार में महागठबंधन की सरकार सिर्फ राजनीति करती है.आरक्षण का दायरा बढ़ाने को लेकर बिहार की सियासत भी गर्म होती जा रही है और आने वाले समय में ये मामला और तूल पकड़ सकता है. क्योंकि बिहार में पहले से ही जातिगत गणना को लेकर सियासत गर्म है. और हर राजनीतिक पार्टी को पता है ये मामला कितना संवेदनशील है. एक गलती उन पर भारी पड़ सकती है.


